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उम्र 30 साल से कम, पहली बार संसद पहुंचे ये सांसद; आखिर कैसे बदलाव की उम्मीद कर रहे आपके-हमारे युवा MP?

NHFS-5 यानी राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार, ऐसे देश में जहां आधी से अधिक जनसंख्या (लगभग 52 प्रतिशत) 30 वर्ष से कम आयु की है. संयुक्त राष्ट्र के जनसंख्या अनुमानों के अनुसार, कम से कम 2078 तक 25 वर्ष से कम आयु के लोगों की संख्या 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों से अधिक होने का अनुमान है, ऐसे में उनकी प्रत्येक अभिव्यक्ति पर सावधानीपूर्वक नजर रखी जाएगी.

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नई दिल्ली के कर्नाटक भवन कैंटीन में बिदर से 26 साल के सांसद सागर खंड्रे नाश्ते के साथ किसी से बात कर रहे थे, तभी एक आदमी उनके पास आता है. वो कहता है कि मैं सागर से हूं और आपसे मिलने के लिए दो दिन की यात्रा करके दिल्ली आया हूं. कुछ मिनट बाद, एक और आदमी सांसद सागर के पास आता है और उनसे बेंगलुरु में एक प्रमुख भारतीय समूह की ओर से बनाई जा रही पाइपलाइन के बारे में बात करता है. एक और व्यक्ति उन्हें एक कार्यक्रम के लिए आमंत्रित करने आता है. सागर उनमें से प्रत्येक से हाथ मिलाते हैं, कन्नड़ में उनका अभिवादन करते हैं और उनके साथ सेल्फी लेते हैं.

राजधानी के दूसरे हिस्से में, उत्तर प्रदेश के कैराना से समाजवादी पार्टी (एसपी) की नवनिर्वाचित सांसद इकरा चौधरी (29 ) भी नए-नए लोगों से मिलने की आदी हो रही हैं. हालांकि, इकरा चौधरी राजनीतिक परिवार से ताल्लुक रखती हैं और राजनीतिक परिवेश में पली-बढ़ी हैं. एक आदमी उनके पास कॉफी शॉप तक जाता है और उन्हें बताता है कि वो उनके काम पर तब से नज़र रख रहा है जब से उन्होंने 2022 के विधानसभा चुनावों में अपने भाई नाहिद हसीन के लिए प्रचार किया था. इकरा चौधरी कहती है कि कैराना दिल्ली से सिर्फ़ 100 किलोमीटर दूर है, इसलिए बहुत से लोग मुझे पहचानते हैं. मुझे हमेशा से कहा गया है कि मैं लोगों को कभी ना नहीं कह सकती.

18वीं लोकसभा के लिए निर्वाचित सागर और इकरा उन 7 सांसदों में शामिल हैं जो पहली बार सांसद चुने गए हैं और उनकी उम्र 30 साल से कम है. ये सभी सातों सांसद अपने निर्वाचन क्षेत्रों के प्रतिनिधि के रूप में देश की सर्वोच्च विधायी संस्था (संसद) में अपनी जगह बनाने और अपनी आवाज बुलंद करने का प्रयास कर रहे हैं. इन सात युवा सांसदों में इकरा चौधरी, सागर खंड्रे के अलावा, प्रिया सरोज, पुष्पेंद्र सरोज, शांभवी चौधरी, संजना जाटव और प्रियंका जारकीहोली शामिल हैं. जिन-जिन सीटों से ये सातों सांसद आते हैं, वहां अभी भी बुनियादी मुद्दों की कमी हैं. ये क्षेत्र अभी भी पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा और स्वास्थ्य के मुद्दों से जूझ रहे हैं. 

आइए, जानते हैं कि पहली बार सांसद बने ये सभी 7 सांसद कैसे हैं? आने वाली चुनौतियों को लेकर, अपने क्षेत्र के विकास को लेकर, बदलते भारत को लेकर ये क्या सोचते हैं?

राजस्थान के भरतपुर से सांसद संजना जाटव एकमात्र ऐसी सांसद हैं, जिनका कोई राजनीतिक बैकग्राउंड नहीं है. वे जिला परिषद के सदस्य के रूप में स्थानीय शासन का हिस्सा रही हैं. जीत के बाद लोकगीत पर नाचती संजना का वायरल वीडियो भारतीय महिला राजनेताओं के लिए खुशी और उत्साह का एक दुर्लभ क्षण था. दूसरी ओर, 7 में से छह सांसदों को राजनीति में एक्टिव परिवार से निश्चित तौर पर समर्थन मिलता है.

25 साल की प्रिया सरोज मछलीशहर से सांसद चुनी गईं हैं. इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, फिलहाल दिल्ली में वे एक अस्थायी आवास में रहती हैं, क्योंकि आधिकारिक सांसद आवास अभी तक आवंटित नहीं किए गए हैं. प्रिया सरोज के पिता तुफानी सरोज तीन बार सांसद रह चुके हैं और वर्तमान में यूपी की केराकत सीट से विधायक हैं.

प्रिया कहती हैं कि कुछ लोग मेरे पिता के साथ 25 साल से काम कर रहे हैं. मैं उनके साथ भी काम करती हूं, खुद भी रिसर्च करती हूं. मेरे पिता मेरा मार्गदर्शन करते हैं. वे 2014 का चुनाव हार गए थे. इन 10 सालों के दौरान बिना किसी पद के वे सिर्फ़ इलाके में घूमते रहे. उन्होंने कहा कि संसद के पहले सेशन के अपने पहले भाषण में मैंने काफी कुछ सीखा.

कर्नाटक के युवा सांसद सागर खंड्रे के पिता ईश्वर खंड्रे कर्नाटक में कैबिनेट मंत्री हैं. सागर कहते हैं कि परिवार का राजनीति में होना एक फ़ायदे की बात है. अगर आप सभी सांसदों को देखें, तो उनमें से ज़्यादातर राजनीतिक पृष्ठभूमि से आते हैं... स्वीकार्य नेतृत्व के बारे में एक बात होती है, है न? ऐसे कनेक्शन के बिना आपके आस-पास के लोगों के लिए आपके नेतृत्व को स्वीकार करना वाकई मुश्किल हो जाता है, चाहे आप कितने भी कुशल या मेहनती या होशियार क्यों न हों.

लेकिन, परिवार से अलग, संसद में भी मार्गदर्शक हैं. उनके बीच की मित्रता को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता. उदाहरण के लिए, जून में संसद के उद्घाटन सत्र के बाद, विपक्ष के एक सीनियर नेता ने अपने घर पर कुछ सांसदों की मेज़बानी की. 30 साल से कम उम्र के इन सांसदों में से कुछ पहली बार यहीं मिले. बाद में, उनमें से कुछ दिल्ली के एक आलीशान इलाके में एक इतालवी रेस्तरां में डिनर के लिए मिले.

चहल-पहल भरे रेस्टोरेंट के शोरगुल के बीच इकरा, पुष्पेंद्र, सागर और प्रिया एक-दूसरे को जानने लगे. स्थानीय अधिकारियों से निपटने और अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों में फंड आवंटन की चुनौतियों पर चर्चा करते हुए उन्हें एक जैसी बातें पता चलीं. उन्होंने पाया कि उनके सामने आने वाली समस्याएं अलग-अलग थीं.

25 साल के सांसद सागर और पुष्पेंद्र के लिए बेरोजगारी का मुद्दा बड़ा

उत्तर प्रदेश के कौशाम्बी से समाजवादी पार्टी के 25 साल के पुष्पेंद्र सरोज और कर्नाटक के सांसद सागर के लिए युवाओं में बेरोजगारी बड़ा मुद्दा है. इकरा चौधरी के लिए गन्ना किसानों की समस्या है और प्रिया सरोज के मछलीशहर में रेलवे लाइन लाने का मुद्दा है.

इकरा कहती हैं कि हम कई बार मिल चुके हैं और कई तरह की बातों पर चर्चा कर चुके हैं... संसद में प्रक्रियाएं होती हैं और वे तार्किक सवाल होते हैं. उदाहरण के लिए, नियम 377, फिर शून्यकाल में सवाल पूछना, लोकसभा में आपके सवालों के लिए बैलेट सिस्टम का होना... ये पेशेवर पहलू हैं. उन्होंने कहा कि हम व्यक्तिगत मोर्चे पर, एक-दूसरे को जान रहे हैं. पुष्पेंद्र सरोज ने लंदन में क्वीन मैरी यूनिवर्सिटी में पढ़ाई की है और मैं SOAS (स्कूल ऑफ ओरिएंटल एंड एशियन स्टडीज, लंदन) में थी. मैंने कानून की पढ़ाई की है, प्रिया ने भी कानून की पढ़ाई की है.

इनमें से कई सांसद बारामती की सांसद सुप्रिया सुले के साथ अपने लगाव के बारे में बताते हैं, जिन्हें वे सुप्रिया ताई कहते हैं. पुष्पेंद्र सरोज कहते हैं कि सुप्रिया जी ने कहा कि अगर हमें किसी मदद की ज़रूरत है, तो हम उनके पास जा सकते हैं क्योंकि वह सबके साथ मिलकर चलती हैं. मैं तिरुवनंतपुरम के सांसद शशि थरूर के पास गया और अपना परिचय दिया. वे भी बहुत अच्छे और अच्छे वक्ता हैं. हवाई अड्डे के लाउंज में, मैं भाजपा के जगदंबिका पाल से मिला, जो एक बहुत अनुभवी राजनेता हैं. वे वही थे जो मेरे पास आए और नमस्ते कहा. यह बहुत अच्छा था.

26 साल की शांभवी को मिली थी सलाह

26 साल की शांभवी सत्तारूढ़ भाजपा के नेतृत्व वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की लोक जनशक्ति पार्टी (रामविलास) की सदस्य हैं. वे कहती हैं कि दक्षिण दिल्ली की सांसद बांसुरी स्वराज और हमीरपुर के सांसद अनुराग ठाकुर ने उन्हें सलाह दी थी. उन्होंने कहा कि मुख्य बात जो मुझे सबसे ज़्यादा याद रही, वो ये थी कि उन्होंने (ठाकुर) मुझसे सभी की बात सुनने को कहा. कहा कि संसद में बैठो और देखो, इससे ही आपको बहुत कुछ सीखने को मिलेगा.  उन्होंने बताया कि मैं अपने पहले भाषण से पहले नर्वस थी, लेकिन उन्होंने मुझे भरोसा दिलाया कि सब कुछ ठीक हो जाएगा और मुझे चिंता करने की ज़रूरत नहीं है. 

सत्र नहीं होता है, तो दिनचर्या अलग ही हो जाती है

वीकेंड में जब सदन की कार्यवाही नहीं चल रही होती और सांसद घर वापस चले जाते हैं, तो उनकी दिनचर्या अलग होती है. शांभवी कहती हैं कि हमारा निर्वाचन क्षेत्र बहुत बड़ा है, जिसमें छह विधानसभा सीटें हैं. लोग दूर-दूर से आपसे मिलने आते हैं... इसलिए, कनेक्टिविटी बहुत महत्वपूर्ण है.

इकरा चौधरी कहती हैं कि मेरा निर्वाचन क्षेत्र मुख्य रूप से ग्रामीण और कृषि प्रधान है. इसलिए, लोगों को अभी तक बिजली बिलों का भुगतान करने की आदत नहीं है. जब भी कोई बदलाव होता है, तो लोगों को उस व्यवस्था में रखना मुश्किल हो जाता है. यही चुनौती है जिसका हम सामना कर रहे हैं, लोगों को बिलों का भुगतान करना शुरू करवाना.

इकरा चौधरी, अपने निर्वाचन क्षेत्र में महिला डॉक्टरों की कमी के बारे में भी बताती हैं. उन्होंने बताया कि तीन विधानसभा क्षेत्रों के लिए सिर्फ़ एक महिला डॉक्टर है... यानी प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल केंद्र में 10 लाख लोगों के लिए एक महिला डॉक्टर. इस एक डॉक्टर को सुनवाई के लिए जाना पड़ता है, अगर बलात्कार के मामले हैं, तो उसे मरीजों को देखना पड़ता है और बच्चों को जन्म भी दिलाना पड़ता है.

सांसद संजना जाटव के लिए पानी की संकट है बड़ा मुद्दा

संसद में अपने पहले भाषण में संजना जाटव ने कहा कि मैं ज़मीन से जुड़ी हुई हूं और किसान परिवार की बेटी हूं, इसलिए किसानों का दर्द महसूस करती हूं. उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र में पानी की कमी को सबसे बड़ा मुद्दा बताया. 

पूर्व सांसद और वर्तमान विधायक इंद्रजीत सरोज के बेटे पुष्पेंद्र सरोज कहते हैं कि उन्हें हर दिन नौकरियों के लिए कॉल आते हैं. यहां तक ​​कि योग्य व्यक्ति भी अपने परिवार का भरण-पोषण करने के लिए हर महीने सिर्फ 5000 से 6000 रुपये चाहते हैं. ये देखना बहुत निराशाजनक है.

सागर खंड्रे, कर्नाटक के कल्याण में धन के लिए अधिक आवंटन की बात करते हैं, जो राज्य का सबसे पिछड़ा क्षेत्र है, जिसके अंतर्गत बीदर आता है.

प्रिया सरोज के लिए एक दलित महिला के रूप में, सशक्तिकरण महत्वपूर्ण है. उनका कहना है कि हमारे गांव में, उच्च और निम्न जातियां अभी भी आपस में नहीं मिल पाती हैं. सांसदों के रूप में भी, हमें इसका सामना करना पड़ा है. हमें कई मंदिरों में जाने की अनुमति नहीं है. 

प्रिया ने एमिटी यूनिवर्सिटी से कानून की पढ़ाई की और अपनी राजनीति को समझा, लेकिन जब लोगों तक अपने विचार पहुंचाने की बारी आई, तो उन्हें एक समस्या का सामना करना पड़ा, वो अंग्रेजी या हिंग्लिश में सोच रही थीं. वह कहती हैं कि मैं अंग्रेज के कुछ शब्दों का इस्तेमाल करती थी. अब मैं जानबूझकर हिंदी शब्दों का इस्तेमाल कर रही हूं. अपने क्षेत्र में हमारे कार्यक्रम जो भी होते हैं, उनमें मैं कोशिश करती हूं कि शुद्ध हिंदी में बोलूं. मैं हर शब्द को पहले से देखती हूं. मैं समानता और अधिकार जैसे शब्दों का इस्तेमाल करती हूं. जब आप इन शब्दों का इस्तेमाल करते हैं, तो क्या होता है? आपके लोग समझ जाते हैं कि आप क्या कहना चाहते हैं.

7 में से तीन (प्रिया, सागर और इकरा) ने कानून की पढ़ाई की है, जबकि शांभवी ने समाजशास्त्र में पोस्ट ग्रेजुएशन किया है और पुष्पेंद्र ने फाइनेंस में ग्रेजुएशन किया है. 

इकरा कहती हैं कि मैं लेडी श्री राम कॉलेज गई हूं, इसलिए मेरे अंदर नारीवाद का बीज है. लेकिन मेरे निर्वाचन क्षेत्र में मुझे जो मिला, वह एक अलग तरह का नारीवाद है. मेरे लिए, उनके लिए लड़ना महत्वपूर्ण है.। यह महिलाओं को उस समानता के स्तर तक लाने के बारे में है, आप जो पहनना चाहते हैं, उसका सवाल बाद में आता है. यह बुनियादी चीजों तक पहुंच बनाने के बारे में है. बहुत ही अजीबोगरीब और उदाहरण आधारित मुद्दे हैं और दिखावट भी मायने रखती है. मैं धार्मिक कारणों और सांस्कृतिक रूप से भी सिर पर दुपट्टा पहनती हूं. मेरी सीट पर जाट महिलाएं और गुज्जर महिलाएं अपना सिर ढकती हैं.

शंभवी कहती हैं कि लोग हमेशा तस्वीरें लेते रहते हैं. इसलिए, आपको हर समय उचित व्यवहार करना होता है. मैं शुरू में सोचती थी कि क्या होगा अगर मैंने कुछ गलत कह दिया? क्या होगा अगर मैंने कुछ गलत लिखा? मुझे ट्रोल किया जाएगा. शुरुआत में, मुझे बहुत सारी नफ़रत भरी टिप्पणियां मिलीं क्योंकि लोगों को वहां एक युवा महिला को देखने की आदत नहीं है... लेकिन जब मैं मैदान में थी, लोगों से बातचीत कर रही थी, तो यही बात वास्तव में मायने रखती है.