वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) को आपराधिक कृत्य घोषित करने की मांग वाली याचिकाओं पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपना पक्ष रखा. केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि मैरिटल रेप को अपराध घोषित करने का निर्णय विधायिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आता है, न कि न्यायपालिका के.
भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने मामले की समीक्षा की. सुप्रीम कोर्ट ने निर्देश दिया कि इस महत्वपूर्ण कानूनी और सामाजिक मुद्दे पर तीन हफ्ते बाद बुधवार और गुरुवार को अंतिम सुनवाई शुरू की जाएगी.
सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने कहा कि शादी में बिना सहमति के संबंध बनाने के लिए मजबूर की गई महिला निश्चित रूप से पीड़ित है. उन्होंने स्पष्ट किया कि विवाह का अर्थ महिला की व्यक्तिगत आजादी का समाप्त होना नहीं है. अदालत दो प्रमुख पहलुओं पर विचार करेगी: पहला, क्या कानूनी छूट के बावजूद मुकदमा चलाया जा सकता है, और दूसरा, क्या यह छूट संवैधानिक रूप से वैध है.
याचिकाकर्ताओं की तरफ से पेश हुईं वरिष्ठ अधिवक्ता करुणा नंदी ने तर्क दिया कि कोई भी पति केवल वैवाहिक संबंध के आधार पर कानूनी छूट का दावा नहीं कर सकता. उन्होंने कहा कि विवाह किसी भी व्यक्ति को अपनी पत्नी की मर्जी के बिना संबंध बनाने या उसे गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाने का कानूनी अधिकार नहीं देता है.
केंद्र सरकार ने अपने पहले दाखिल हलफनामे में कहा था कि मैरिटल रेप को अलग से आपराधिक कृत्य मानने से वैवाहिक संस्था की स्थिरता प्रभावित हो सकती है. सरकार के अनुसार, विवाह के भीतर ऐसे मामलों का निपटारा आम दुष्कर्म की धाराओं के बजाय भारतीय न्याय संहिता (BNS) के अन्य मौजूदा कानूनी प्रावधानों के तहत किया जाना चाहिए.