El Nino, La Nina: भारत की बारिश को कम और ज्यादा करती हैं 'दो बहनें', समझिए पूरा खेल
Indian Monsoon: भारत में किसी साल खूब बारिश होती है तो किसी साल सूखा पड़ जाता है. क्या आप इसके पीछे की असली वजह समझते हैं?
पिछले कुछ सालों से भारत के मौसम में लगातार बदलाव देखने को मिल रहा है. देश में आज से 10 साल पहले जिस तरह की बारिश और तापमान में विविधता थी. अब वैसा देखने को नहीं मिलता. कुछ जगहों पर बिना मौसम के जरूरत से ज्यादा बारिश हो जाती है, तो कुछ जगहों पर ऐसा सूखा पड़ता है कि लोग पानी की बूंद-बूंद के लिए तरसने लगते हैं. भारत का मौसम कुछ दशकों से अल नीनो और ला नीना जैसी घटनाओं से बदल रहा है. जब भारत अल नीनो की चपेट में रहता है तो यहां सूखा पड़ता है और जब भारत ला नीना की चपेट में रहता है तो यहां जरूरत से ज्यादा बारिश होती है.
आइए समझते हैं कि अल नीनो और ला नीना कैसे बनता है. दोनों में क्या अन्तर है और यह भारत के मानसून को कैसे प्रभावित करता है? दुनिया में किसी भी जगह का मौसम डायरेक्ट या इनडायरेक्ट तरीके से अपने आसपास की जलवायु को प्रभावित करता है. भारत की जलवायु प्रशान्त महासागर से सीधे जुड़ी हुई है या यूं कहें कि भारत का मानसून प्रशांत महासागर की जलवायु पर ही आधारित रहती है.
ट्रेड विंड्स करती हैं खेल
आमतौर पर प्रशांत महासागर में ट्रेड विंड्स भूमध्य रेखा के साथ बहती हैं. ये हवाएं दक्षिणी अमेरिका से एशिया की ओर यानी पश्चिम से पूरब की ओर बहती हैं. जब हवाएं चलती हैं तो प्रशांत महासागर की सतह पर मौजूद पानी के तापमान को प्रभावित करती हैं. जब गर्म हवा समुद्र की सतह से गुजरती है तो सतह के पानी को गर्म कर देती है. जिसका नतीजा यह होता है कि समुद्र के ऊपरी सतह का पानी गर्म हो जाता है और नीचे का पानी ठंडा. तापमान में बदलाव के कारण ये एक-दूसरे की जगह लेते रहते है. नतीजा यह होता कि प्रशांत महासागर की हवाओं के साथ-साथ महासागर के पानी के तापमान में भी बदलाव हो जाता है. जो पूरे विश्व के जलवायु को प्रभावित करता है.
अल नीनो और ला नीना ही इन परिस्थतियों की अहम वजह हैं. दोनों का प्रभाव एक-दूसरे के विपरीत है यानी जब ला नीना आता है तो समुद्र के सतह का तापमान कम हो जाता है. वहीं जब अल नीनो आता है तो सतह के पानी के तापमान में बढ़ोतरी हो जाती है. अल नीनो के प्रभाव में दक्षिणी अमेरिका के पेरू तट पर दबाव उत्तरी ऑस्ट्रेलिया और पूर्वी एशिया के मुकाबले ज्यादा रहता है क्योंकि हिंद महासागर आसपास के महासागरों की तुलना में गर्म है, इसलिए इसका दबाव कम होता है.
कैसे बढ़ती या घटती है बारिश?
इसका नतीजा यह होता है कि पश्चिमी प्रशांत महासागर से हिंद महासागर की ओर से नमी भरी हवाएं चलती हैं. अल नीनो के कारण पेरू के तट पर सतह पर मौजूद ठंडा पानी गर्म हो जाता है. समुद्र के गर्म होने पर नियमित ट्रेड विंड खो जाती हैं या अपनी दिशा बदल लेती है. नतीजा यह निकलता है कि पेरू के तटीय क्षेत्रों में ज्यादा बारिश होती है. इस क्षेत्र की जलवायु के तापमान और दबाव में जितना ज्यादा अंतर होगा. भारत में बारिश की कमी उतनी ही ज्यादा होगी.
वही ला नीना के प्रभाव में पूर्वी प्रशांत क्षेत्र में पानी का तापमान औसत से नीचे चला जाता है. नतीजतन पूर्वी भूमध्यरेखीय प्रशांत क्षेत्र पर एक शक्तिशाली उच्च दबाव प्रणाली बन जाती है. निम्न दबाव अब पश्चिमी प्रशांत क्षेत्र और एशिया के तट पर बनने लगता है. ला नीना के कारण पेरू और इक्वाडोर में सूखा पड़ता है और ऑस्ट्रेलिया में बाढ़ आती है, पश्चिमी प्रशांत, हिंद महासागर और सोमालिया के तट पर उच्च तापमान होता है और भारत में प्रचुर मात्रा में मानसूनी बारिश होती है.
जब भारत की जलवायु अल नीनो के प्रभाव में आती है तो भारत में गर्मी बढ़ जाती है. उस साल बारिश सामान्य से कम होती है. वहीं ला नीना के समय भारत में मानसूनी बारिश सामान्य से ज्यादा होती है. उस साल भारत में ठंड़ भी ज्यादा पड़ती है. इसके अलावा अटलांटिक महासागर और बंगाल की खाड़ी में चक्रवाती तुफान लाने में भी यह जिम्मेदार होता है.