क्या मंदिरों में गैर हिंदुओं की नो-एंट्री का बदलेगा नियम? केरल हाईकोर्ट ने की अहम टिप्पणी; दशकों पुरानी परंपरा पर फिर उठा सवाल
केरल हाई कोर्ट ने मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर रोक लगाने वाले नियम की समीक्षा का सुझाव दिया है. कोर्ट ने कहा कि यह नियम मौलिक कानून के खिलाफ है. सभी संबंधित पक्षों से बातचीत के बाद अंतिम फैसला राज्य सरकार को लेना होगा.
तिरुवनंतपुरम: क्या हिंदू मंदिरों में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर लगा बैन भविष्य में हटाया जा सकता है? केरल हाई कोर्ट के एक अहम फैसले के बाद इस सवाल पर एक नई बहस शुरू हो गई है. कोर्ट ने दो ईसाई पादरियों के मंदिर में प्रवेश को लेकर दायर एक याचिका खारिज कर दी.
हालांकि कोर्ट ने राज्य सरकार से उस नियम की समीक्षा करने को भी कहा जो गैर-हिंदुओं को मंदिरों में प्रवेश से रोकता है. कोर्ट ने संकेत दिया कि यह नियम दशकों पुराना है और मौजूदा संवैधानिक मूल्यों और सामाजिक बदलावों की रोशनी में इसकी जांच करने की जरूरत है.
कोर्ट ने क्या दिया सुझाव?
रिपोर्ट के अनुसार हाई कोर्ट ने अपने फैसले में साफ तौर पर कहा कि कानून समय के साथ बदलता है और समाज की जरूरतों के हिसाब से इसमें बदलाव होना चाहिए. कोर्ट ने सुझाव दिया कि राज्य सरकार इस नियम को बनाए रखने या इसमें संशोधन करने पर विचार करे और इस प्रक्रिया में धार्मिक विद्वानों, त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड, मंदिर के पुजारियों और अन्य संबंधित पक्षों से सलाह ले. इस फैसले ने धार्मिक परंपराओं और संवैधानिक अधिकारों के बीच संतुलन को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है.
कब से शुरु हुआ यह मामला?
यह मामला 2023 का है जब केरल के अडूर में श्री पार्थसारथी मंदिर में दो ईसाई पादरियों को आमंत्रित किया गया और उन्हें प्रवेश दिया गया. यह मंदिर त्रावणकोर देवस्वोम बोर्ड के तहत आता है. एक व्यक्ति अनिल नारायणन नंबूथिरी ने इस घटना के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की. याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह प्रवेश केरल हिंदू सार्वजनिक पूजा स्थल अधिनियम, 1965 और इससे जुड़े नियमों का उल्लंघन है, क्योंकि नियम 3(a) गैर-हिंदुओं को मंदिर में प्रवेश से रोकता है.
इस मामले में कोर्ट ने क्या कहा?
मामले की सुनवाई करते हुए, हाई कोर्ट की डिवीजन बेंच ने पाया कि मूल कानून में गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर स्पष्ट रूप से रोक नहीं है, जबकि नियम 3(a) ऐसी पाबंदी लगाता है. कोर्ट ने कहा कि अगर नियमों और मूल कानून के बीच कोई टकराव होता है, तो मूल कानून ही मान्य होगा. कोर्ट ने यह भी माना कि गैर-हिंदुओं के प्रवेश पर पाबंदी को एक धार्मिक परंपरा माना जा सकता है, लेकिन इसे हिंदू धर्म का जरूरी धार्मिक अभ्यास नहीं कहा जा सकता.
कौन लेगा इस मामले में अंतिम फैसला?
हाई कोर्ट ने साफ किया कि इस मामले पर अंतिम फैसला राज्य सरकार को लेना है. कोर्ट ने सुझाव दिया कि सरकार को सभी संबंधित पक्षों से सलाह लेनी चाहिए और एक संतुलित फैसला लेना चाहिए. इस प्रक्रिया में देवास्वोम बोर्ड, धार्मिक विद्वानों और मंदिर प्रशासन की भूमिका को बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है.
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