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जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच में बड़ा खुलासा, कैश कांड के तीनों आरोप सही पाए गए

जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच समिति ने तीनों आरोप सही पाए हैं. समिति ने सरकारी आवास में बड़ी मात्रा में बेहिसाब नकदी मिलने, सबूत सुरक्षित न रखने और जवाब संतोषजनक न होने की बात कही.

KanhaiyaaZee
जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ जांच में बड़ा खुलासा, कैश कांड के तीनों आरोप सही पाए गए
Courtesy: Social Media

नई दिल्ली:  दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस यशवंत वर्मा के खिलाफ गठित जांच समिति की रिपोर्ट में तीनों आरोप साबित होने की बात सामने आई है. समिति ने कहा कि उनके सरकारी आवास के परिसर में आग लगने के बाद स्टोररूम से बड़ी मात्रा में 500 रुपये के नोट मिले थे. हालांकि रिपोर्ट ने यह निष्कर्ष नहीं दिया कि नकदी कानूनी तौर पर व्यक्तिगत रूप से जस्टिस वर्मा की थी. मामला अब न्यायिक जवाबदेही और संवैधानिक प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण बन गया है.

लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला की ओर से न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत समिति गठित की गई थी. जांच में बड़ी मात्रा में नकदी की मौजूदगी, घटनास्थल पर साक्ष्य सुरक्षित नहीं रखने और जस्टिस वर्मा के स्पष्टीकरण से जुड़े तीन आरोपों की पड़ताल हुई. समिति ने माना कि स्टोररूम में बिखरे हुए कुछ नोट नहीं, बल्कि नोटों के बंडल और ढेर मौजूद थे. हालांकि नकदी की सही रकम निर्धारित नहीं हो सकी.

नकदी का स्रोत और मालिकाना हक स्पष्ट नहीं हुआ

समिति के मुताबिक, जस्टिस वर्मा यह संतोषजनक तरीके से नहीं बता सके कि नकदी वहां कैसे पहुंची, उसका मालिक कौन था और उसका स्रोत क्या था. उन्होंने यह तर्क दिया था कि स्टोररूम उनके नियंत्रण में नहीं था. समिति ने इस दावे को स्वीकार नहीं किया और कहा कि यह उनके आधिकारिक आवासीय परिसर का हिस्सा था तथा संस्थागत नियंत्रण में था.

आग के बाद सबूत सुरक्षित नहीं रखे गए

जांच में यह भी सामने आया कि आग लगने के बाद स्टोररूम को तत्काल सील नहीं किया गया. प्रथम प्रतिक्रिया देने वाले अधिकारियों के चले जाने के बाद वहां सफाई की गई. औपचारिक निरीक्षण तक नकदी मौके पर मौजूद नहीं थी. समिति ने इसे महत्वपूर्ण साक्ष्य को सुरक्षित रखने में विफलता माना. हालांकि रिपोर्ट ने यह नहीं कहा कि जस्टिस वर्मा ने खुद नकदी हटाई थी.

जस्टिस वर्मा ने आरोपों से किया इनकार

जस्टिस वर्मा ने आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि उनके आवास से कोई नकदी बरामद नहीं हुई थी. उन्होंने साजिश, नकदी रखे जाने, नकली नोट और घटनास्थल पर मौजूद लोगों द्वारा रकम हटाए जाने जैसी संभावनाएं भी उठाईं. समिति ने कहा कि इन दावों के समर्थन में पर्याप्त बचाव साक्ष्य पेश नहीं किए गए. बाद में जस्टिस वर्मा ने साक्ष्य और जिरह की प्रक्रिया पूरी होने के बाद आगे की कार्यवाही में भाग लेना बंद कर दिया.

समिति की रिपोर्ट आपराधिक दोषसिद्धि नहीं है. उसने संसदीय हटाने की प्रक्रिया के लिए तीनों आरोपों को सिद्ध माना है, लेकिन नकदी को व्यक्तिगत रूप से जस्टिस वर्मा का नहीं बताया. विवाद 14 मार्च 2025 को उनके दिल्ली स्थित सरकारी आवास में लगी आग के बाद शुरू हुआ था. जांच के बीच उनका तबादला इलाहाबाद हाईकोर्ट किया गया. बाद में उन्होंने न्यायाधीश पद से इस्तीफा दे दिया, जिससे उनके खिलाफ संसद से हटाने की प्रक्रिया निष्प्रभावी हो गई.