US से 500 अरब डॉलर का इम्पोर्ट प्लान, क्या डिमांड पूरी कर पाएगा अमेरिका? जानें क्या-क्या खरीदेगा भारत
भारत और अमेरिका के बीच ट्रेड एग्रीमेंट के तहत, भारत पांच सालों में 500 अरब डॉलर का सामान इंपोर्ट करेगा. इस टारगेट में एनर्जी, हाई-टेक और एविएशन सेक्टर अहम हैं.
नई दिल्ली: भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए ऐतिहासिक व्यापार समझौते के तहत भारत ने अगले पांच सालों में अमेरिका से $500 बिलियन लगभग ₹41 लाख करोड़ के सामान इंपोर्ट करने का वादा किया है, जिससे ग्लोबल ट्रेड की दिशा बदल सकती है. हालांकि, एक्सपर्ट्स का मानना है कि इस टारगेट की सफलता न सिर्फ भारतीय कंपनियों के ऑर्डर्स पर बल्कि अमेरिकी सप्लायर्स की सप्लाई कैपेसिटी पर भी निर्भर करेगी.
शनिवार को जारी जॉइंट स्टेटमेंट के बाद उन सेक्टर्स पर चर्चा तेज हो गई है जिनमें भारत अपनी खरीदारी बढ़ाएगा. इस इंपोर्ट टारगेट को हासिल करने में एनर्जी सेक्टर सबसे बड़ी भूमिका निभाएगा. डेटा के अनुसार मौजूदा फाइनेंशियल ईयर के पहले नौ महीनों में भारत ने अमेरिका से लगभग $40 बिलियन के सामान इंपोर्ट किए, जिसमें से $11 बिलियन सिर्फ कच्चे तेल और पेट्रोलियम प्रोडक्ट्स के लिए था. यह पिछले साल के मुकाबले 35 प्रतिशत ज्यादा है.
भारत अब किसको देगा प्राथमिकता?
भारत अब अपनी एनर्जी जरूरतों के लिए रूसी तेल के बजाय अमेरिकी तेल को प्राथमिकता दे रहा है. भारत इंडोनेशिया से आने वाले कोकिंग कोल के बजाय अमेरिकी कोयले को भी पसंद कर सकता है. अधिकारियों के अनुसार अमेरिकी कोयला न सिर्फ क्वालिटी में बेहतर है, बल्कि उसकी कीमत भी कॉम्पिटिटिव है. भारतीय तेल कंपनियों ने पहले ही ज्यादा लिक्विफाइड नेचुरल गैस यानी LNG खरीदने के लिए एग्रीमेंट साइन कर लिए हैं.
पीयूष गोयल ने क्या कहा?
वाणिज्य और उद्योग मंत्री पीयूष गोयल के अनुसार चिप्स, सेमीकंडक्टर और एयरक्राफ्ट जैसे हाई-टेक प्रोडक्ट्स इस $500 बिलियन के टारगेट तक पहुंचने में अहम होंगे. भारत अकेले बोइंग के साथ $70 से $80 बिलियन के नए ऑर्डर देने की तैयारी कर रहा है. डेटा सेंटर और AI के लिए जरूरी ग्राफिक्स प्रोसेसिंग यूनिट और हाई-एंड चिप्स की खरीदारी में भी काफी बढ़ोतरी होने की उम्मीद है.
क्या आ सकती हैं टेक्निकल रुकावटें?
इस महत्वाकांक्षी प्लान में कुछ टेक्निकल रुकावटें भी हैं. उदाहरण के लिए, बोइंग जैसी कंपनियों के पास पहले से ही ऑर्डर्स का बहुत बड़ा बैकलॉग है. सवाल यह है कि क्या अमेरिकी कंपनियां समय पर डिलीवरी कर पाएंगी. इसी तरह ग्लोबल मार्केट में सेमीकंडक्टर चिप्स की बहुत ज्यादा डिमांड है. इन प्रोडक्ट्स को हासिल करने के लिए भारतीय खरीदारों को ग्लोबल लाइन में लगना होगा.
गोयल ने कहा, 'यह अमेरिकी वेंडर्स पर निर्भर करता है कि वे भारतीय खरीदारों को ऐसा ऑफर दें जिसे वे मना न कर सकें. $100 बिलियन प्रति वर्ष का टारगेट पहले साल में शायद हासिल न हो लेकिन हम उसी दिशा में आगे बढ़ रहे हैं.'