नई दिल्ली: कूटनीति में अक्सर कहा जाता है कि असली काम शोर से नहीं नतीजों से पहचाना जाता है. हाल के घटनाक्रम में यही फर्क साफ दिखाई देता है. एक तरफ पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ हुई डील को बड़ी उपलब्धि बताकर पेश कर रहा है. वहीं दूसरी तरफ भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) ने बिना किसी हंगामे के ऐसा फैसला लिया है, जिसने वैश्विक मंच पर भारत की आर्थिक और रणनीतिक ताकत को और मजबूत कर दिया है.
यूएई के राष्ट्रपति शेख मोहम्मद बिन जायद अल नाहयान की भारत यात्रा भले ही बहुत छोटी रही, लेकिन इसके फैसले दूरगामी हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से उनकी मुलाकात महज कुछ समय की थी लेकिन इसी दौरान दोनों देशों ने अपने द्विपक्षीय व्यापार को नई ऊंचाइयों तक ले जाने का लक्ष्य तय कर लिया.
अगर सिर्फ आंकड़ों की भाषा में बात करें तो तस्वीर खुद-ब-खुद साफ हो जाती है. पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ करीब 20 अरब डॉलर के व्यापार और निवेश लक्ष्य की बात कर रहा है, जबकि उसका मौजूदा व्यापार अभी भी सीमित दायरे में है. वहीं भारत और यूएई का आपसी व्यापार पहले ही 100 अरब डॉलर को पार कर चुका है. अब दोनों देशों ने इसे अगले कुछ वर्षों में 200 अरब डॉलर तक ले जाने का लक्ष्य रखा है.
भारत-यूएई समझौते की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसमें कर्ज की जगह सीधे निवेश पर जोर दिया गया है. गुजरात के धोलेरा क्षेत्र में बड़े स्तर पर विकास परियोजनाओं पर सहमति बनी है. यहां अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, आधुनिक शहर और बंदरगाह विकसित किए जाएंगे. यह निवेश भारत के औद्योगिक और बुनियादी ढांचे को नई गति देगा.
भारत और यूएई की साझेदारी सिर्फ व्यापार तक सीमित नहीं है. दोनों देश भविष्य की तकनीकों पर मिलकर काम करने जा रहे हैं. अंतरिक्ष क्षेत्र में सैटेलाइट निर्माण और लॉन्च सुविधाओं पर सहयोग, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, स्वच्छ ऊर्जा और परमाणु ऊर्जा जैसे क्षेत्रों में साझा प्रयास इस बात का संकेत हैं कि यह रिश्ता लंबी सोच पर आधारित है.
दोनों देशों ने रक्षा क्षेत्र में भी रणनीतिक सहयोग बढ़ाने का फैसला किया है. अब बात सिर्फ हथियार खरीदने-बेचने तक सीमित नहीं रहेगी बल्कि साथ मिलकर रक्षा उपकरण बनाने पर जोर दिया जाएगा. इससे भारत के रक्षा उद्योग को नई ताकत मिलेगी और आत्मनिर्भरता की दिशा में बड़ा कदम साबित होगा.
भारत और पाकिस्तान के बीच अंतर सिर्फ आर्थिक आंकड़ों का नहीं, बल्कि सोच और नीति का भी है. भारत पहले मजबूत आधार तैयार करता है और फिर बड़े लक्ष्य तय करता है. वहीं पाकिस्तान अक्सर उम्मीदों और कर्ज के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश करता है.