R&D पर भारत की रफ्तार बढ़ी, लेकिन चीन-अमेरिका से अभी भी बहुत पीछे; जानिए कौन कितना करता है खर्च
भारत का R&D खर्च 2023-24 में बढ़कर 2.45 लाख करोड़ रुपये और GDP का 0.84% हुआ, लेकिन चीन, अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया की तुलना में अंतर अभी बड़ा है.
भारत में रिसर्च एंड डेवलपमेंट यानी अनुसंधान एवं विकास पर खर्च हाल के वर्षों में तेजी से बढ़ा है. विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी विभाग (DST) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत का Gross Expenditure on Research and Development (GERD) 2023-24 में बढ़कर करीब 2.45 लाख करोड़ रुपये हो गया. यह देश के GDP का 0.84% है. 2020-21 में GERD 1.27 लाख करोड़ रुपये और GDP का 0.64% था. यानी तीन वर्षों में R&D खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है.
सरकार अब भी R&D की बड़ी ताकत
भारत में R&D की फंडिंग में सरकार की भूमिका अभी भी अहम है. नवीनतम आंकड़ों के मुताबिक 2023-24 में सरकारी क्षेत्र का संयुक्त हिस्सा करीब 48.2%था, जबकि निजी उद्योग की हिस्सेदारी 45.2% तक पहुंच गई. केंद्रीय सरकारी संस्थानों की हिस्सेदारी करीब 30.9% रही. इसका अर्थ है कि 2.45 लाख करोड़ रुपये के कुल R&D खर्च में सरकारी क्षेत्र का योगदान मोटे तौर पर 1.18 लाख करोड़ रुपये के आसपास बैठता है. हालांकि यह कुल सरकारी क्षेत्र का अनुमानित हिस्सा है, इसे सिर्फ केंद्रीय बजट का R&D आवंटन नहीं माना जाना चाहिए.
चीन ने भारत से कई गुना ज्यादा लगाया पैसा
चीन ने R&D में भारत से काफी आक्रामक निवेश किया है. चीन के राष्ट्रीय सांख्यिकी ब्यूरो के अनुसार, 2024 में चीन का R&D खर्च 3.613 ट्रिलियन युआन रहा, जो GDP का 2.68% था. 2025 में यह बढ़कर 3.926 ट्रिलियन युआन, यानी GDP का 2.80% हो गया.
Also Read
अमेरिका, जापान और कोरिया भी आगे
OECD के 2023 के तुलनीय आंकड़ों के अनुसार अमेरिका ने R&D पर GDP का 3.42%, जापान ने 3.44%, जर्मनी ने 3.13% और दक्षिण कोरिया ने 4.94% खर्च किया. इजरायल इस मामले में सबसे आगे रहा, जहां R&D खर्च GDP का करीब 6.96% था. OECD क्षेत्र का औसत लगभग 2.70% रहा.
वैश्विक तस्वीर में भारत की स्थिति
UNESCO Institute for Statistics के मुताबिक 2023 में वैश्विक स्तर पर R&D पर औसत खर्च GDP का करीब 1.92% था. यूरोप और उत्तरी अमेरिका में यह 2.55% और पूर्वी व दक्षिण-पूर्वी एशिया में 2.42% रहा. ऐसे में भारत का 0.84% स्तर वैश्विक औसत से भी काफी कम है.
अर्थशास्त्री राकेश मोहन की चिंता
अर्थशास्त्री और पूर्व RBI डिप्टी गवर्नर राकेश मोहन ने भारत में R&D पर कम खर्च को आर्थिक विकास की बड़ी चुनौती बताया है. उनके CSEP पेपर के अनुसार, भारत का R&D खर्च लंबे समय तक GDP के करीब 0.6-0.75% के आसपास रहा, जबकि चीन इसी अवधि में 2% से अधिक तक पहुंच गया और दक्षिण कोरिया करीब 4.2% तक पहुंच गया. मोहन के मुताबिक भारत में R&D को सार्वजनिक और निजी दोनों क्षेत्रों में बढ़ाने तथा उद्योग को तकनीकी निवेश के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है.
निजी क्षेत्र की भूमिका सबसे अहम
भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ सरकारी खर्च बढ़ाना नहीं, बल्कि निजी कंपनियों को रिसर्च में बड़े पैमाने पर निवेश के लिए तैयार करना है. OECD के मुताबिक विकसित अर्थव्यवस्थाओं में बिजनेस सेक्टर R&D का सबसे बड़ा हिस्सा करता है. 2024 में OECD क्षेत्र में कुल R&D खर्च का करीब 73% बिजनेस सेक्टर से आया. भारत में निजी उद्योग की हिस्सेदारी अब 45.2% तक पहुंचना सकारात्मक बदलाव है, लेकिन चीन, अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया जैसी अर्थव्यवस्थाओं से प्रतिस्पर्धा के लिए इसे और बढ़ाना होगा.
2% का लक्ष्य अभी दूर
भारत की विज्ञान नीति में लंबे समय से R&D खर्च को GDP के 2%तक ले जाने की महत्वाकांक्षा रही है. नवीनतम 0.84% आंकड़ा प्रगति दिखाता है, लेकिन 2% लक्ष्य हासिल करने के लिए निवेश को अभी दोगुने से भी ज्यादा बढ़ाना होगा. सरकार ने अनुसंधान, विकास और नवाचार (RDI) योजना के तहत 1 लाख करोड़ रुपये का फंड भी शुरू किया है. इसका उद्देश्य निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाकर भारत में डीप-टेक और उच्च तकनीक आधारित अनुसंधान को गति देना है.
चीन से मुकाबला सिर्फ पैसे का नहीं
R&D में भारत और चीन के बीच अंतर केवल बजट का नहीं है. चीन ने रिसर्च को सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रिक वाहन, बैटरी, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, उन्नत सामग्री और ऊर्जा जैसी रणनीतिक औद्योगिक प्राथमिकताओं से जोड़ा है. OECD के अनुसार 2023 में चीन के R&D खर्च की वृद्धि 8.7% रही और PPP आधार पर उसका कुल R&D खर्च अमेरिका के करीब 96% तक पहुंच गया. भारत के लिए चुनौती अब यह है कि बढ़ते निवेश को पेटेंट, नई तकनीक, उत्पादकता और वैश्विक कंपनियों में बदलने की क्षमता भी उतनी ही तेजी से विकसित हो.
ये आंकड़े भारत के DST R&D डेटा, OECD R&D Statistics, UNESCO Institute for Statistics, चीन के National Bureau of Statistics और राकेश मोहन के CSEP अध्ययन पर आधारित हैं.