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भारत का पहला चुनाव कैसे हुआ था? जानिए 1951-52 के ऐतिहासिक आम चुनाव की पूरी कहानी

भारत का पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ था. जानिए 17 करोड़ मतदाताओं, 489 लोकसभा सीटों, बैलेट बॉक्स, चुनाव चिह्न और सुकुमार सेन से जुड़ी इस ऐतिहासिक चुनावी कहानी के बारे में.

KanhaiyaaZee
भारत का पहला चुनाव कैसे हुआ था? जानिए 1951-52 के ऐतिहासिक आम चुनाव की पूरी कहानी
Courtesy: AI Generated

नई दिल्ली: आज भारत में चुनाव कराना एक स्थापित प्रक्रिया है. चुनाव आयोग, इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन, वोटर आईडी, सोशल मीडिया प्रचार और लाखों मतदान केंद्रों के बीच हर पांच साल में करोड़ों लोग अपने प्रतिनिधि चुनते हैं. लेकिन कभी आपने सोचा है कि आज की इस विशाल चुनावी व्यवस्था की शुरुआत कैसे हुई थी?

आजाद भारत का पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ था. यह सिर्फ भारत का पहला लोकसभा चुनाव नहीं था, बल्कि लोकतंत्र के इतिहास में एक असाधारण प्रयोग था. देश अभी-अभी आजाद हुआ था, आबादी का बड़ा हिस्सा निरक्षर था, सड़कों और संचार की व्यवस्था सीमित थी और करोड़ों लोगों के पास चुनाव जैसी प्रक्रिया का कोई प्रत्यक्ष अनुभव नहीं था. इसके बावजूद भारत ने सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार के आधार पर चुनाव कराने का फैसला किया.

25 अक्टूबर 1951 से शुरू होकर 21 फरवरी 1952 तक चले इस चुनाव में करीब 17.32 करोड़ मतदाता पंजीकृत हुए और 10.59 करोड़ से अधिक लोगों ने मतदान किया.

लेकिन इस ऐतिहासिक चुनाव की कहानी सिर्फ आंकड़ों की नहीं है. यह कहानी है एक ऐसे देश की, जिसने लोकतंत्र पर भरोसा किया और उसे जमीन पर उतारने के लिए ऐसी चुनावी व्यवस्था खड़ी की, जिसका दुनिया में उस समय कोई बड़ा उदाहरण मौजूद नहीं था.

आजादी के बाद सबसे बड़ा सवाल था- जनता सरकार कैसे चुनेगी?

15 अगस्त 1947 को भारत आजाद हुआ, लेकिन देश के सामने लोकतांत्रिक शासन की पूरी व्यवस्था तैयार करने की चुनौती थी. संविधान सभा संविधान बनाने के साथ-साथ अंतरिम संसद के रूप में भी काम कर रही थी.

26 नवंबर 1949 को संविधान स्वीकार किया गया और 26 जनवरी 1950 को यह लागू हुआ. संविधान ने भारत को लोकतांत्रिक गणराज्य बनाने के साथ नागरिकों को समान राजनीतिक अधिकार देने की नींव रखी.

उस समय एक बड़ा और साहसिक फैसला लिया गया- वयस्क मताधिकार.

मतलब यह कि संपत्ति, शिक्षा, जाति या सामाजिक हैसियत के आधार पर मतदान का अधिकार सीमित नहीं किया जाएगा. निर्धारित आयु पूरी करने वाला नागरिक मतदान कर सकेगा.

यह फैसला इसलिए भी ऐतिहासिक था क्योंकि उस दौर में भारत की आबादी का बड़ा हिस्सा निरक्षर था. फिर भी संविधान निर्माताओं ने यह नहीं माना कि निरक्षर व्यक्ति लोकतांत्रिक फैसला लेने में सक्षम नहीं है.

चुनाव कराने की जिम्मेदारी किसके कंधों पर थी?

भारत में स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए चुनाव आयोग की स्थापना 25 जनवरी 1950 को हुई. इसके पहले मुख्य चुनाव आयुक्त बने सुकुमार सेन.

सेन के सामने ऐसा काम था, जिसकी विशालता का अंदाजा आज के आंकड़ों से भी लगाया जा सकता है. पूरे देश में मतदाता सूची तैयार करनी थी, निर्वाचन क्षेत्रों का निर्धारण करना था, उम्मीदवारों को चुनाव लड़ने की व्यवस्था करनी थी, मतदान केंद्र बनाने थे और करोड़ों मतदाताओं को मतदान की प्रक्रिया समझानी थी.

राष्ट्रपति भवन के आधिकारिक अभिलेखों में भी 1951 में सुकुमार सेन और चुनाव आयोग के अधिकारियों को भारत के पहले आम चुनाव के लिए विशेष रूप से तैयार किए गए बैलेट बॉक्स की जांच करते हुए दर्ज किया गया है.

भारत निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड में सुकुमार सेन को देश का पहला मुख्य चुनाव आयुक्त बताया गया है और उनके नेतृत्व में 1951-52 तथा 1957 के पहले दो आम चुनावों के संचालन का उल्लेख मिलता है.

सबसे पहले तैयार हुई मतदाता सूची

आज किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में ऑनलाइन देखा जा सकता है. 1950 के दशक में ऐसा कुछ नहीं था.

चुनाव आयोग को देशभर में जाकर यह पता लगाना था कि मतदान करने योग्य कौन-कौन लोग हैं. गांवों, कस्बों और दूरदराज के इलाकों तक कर्मचारियों को भेजा गया. लोगों के नाम दर्ज किए गए और मतदाता सूचियां तैयार की गईं.

15 नवंबर 1951 तक पहले आम चुनाव के लिए मतदाता सूचियां तैयार हो चुकी थीं.

पहले आम चुनाव में 17,32,12,343 मतदाता पंजीकृत थे. यह संख्या उस समय के लिहाज से इतनी बड़ी थी कि भारत का चुनाव अपने आप में दुनिया का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक चुनावी प्रयोग बन गया था.

एक खास बात- उस समय मतदान की उम्र 21 साल थी

आज भारत में 18 वर्ष की उम्र पूरी करने वाला नागरिक मतदान कर सकता है. लेकिन पहले आम चुनाव के समय मतदान की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष थी.

बाद में संविधान में संशोधन के जरिए मतदान की उम्र 21 से घटाकर 18 वर्ष कर दी गई.

इसलिए 1951-52 का चुनाव आज के चुनाव से तुलना करने पर कई मायनों में बिल्कुल अलग दिखाई देता है.

489 सीटें, लेकिन निर्वाचन क्षेत्र 401

पहले लोकसभा चुनाव में आज की तरह 543 सीटें नहीं थीं.

उस समय लोकसभा में 489 निर्वाचित सीटें थीं. ये सीटें 401 निर्वाचन क्षेत्रों में थीं. भारत निर्वाचन आयोग के आधिकारिक चुनावी आंकड़ों में 1951 के चुनाव के लिए 489 सीटों का विवरण दर्ज है.

इनमें 314 निर्वाचन क्षेत्र ऐसे थे जहां से एक प्रतिनिधि चुना जाना था. 86 निर्वाचन क्षेत्रों में दो प्रतिनिधि चुने जाने थे, जबकि एक निर्वाचन क्षेत्र ऐसा था जहां से तीन प्रतिनिधि चुने गए.

बहु-सदस्यीय निर्वाचन क्षेत्रों की व्यवस्था उस समय सामाजिक रूप से पिछड़े और अनुसूचित वर्गों को प्रतिनिधित्व देने की व्यवस्था का हिस्सा थी. बाद में यह व्यवस्था समाप्त कर दी गई.

सबसे बड़ी चुनौती थी- करोड़ों निरक्षर मतदाता

पहले चुनाव की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक थी निरक्षरता.

आज मतदाता बैलेट पेपर या ईवीएम पर उम्मीदवार का नाम और चुनाव चिह्न देखकर अपना वोट देता है. लेकिन उस समय बड़ी संख्या में मतदाता पढ़ना-लिखना नहीं जानते थे.

ऐसे में चुनाव आयोग ने चुनाव चिह्नों को बेहद महत्वपूर्ण बनाया.

राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों को ऐसे प्रतीक दिए गए जिन्हें आम मतदाता आसानी से पहचान सके. यह भारतीय चुनाव व्यवस्था की एक ऐसी विशेषता बनी, जो आगे चलकर लोकतंत्र का स्थायी हिस्सा बन गई.

इतिहासकार रामचंद्र गुहा ने भी पहले चुनाव को लेकर लिखा है कि चुनाव आयोग के सामने बड़ी चुनौती एक ऐसे मतदाता वर्ग के लिए पार्टी प्रतीकों, मतपत्रों और मतदान व्यवस्था को तैयार करना था, जिसमें निरक्षरता बहुत व्यापक थी.

ईवीएम नहीं, हर उम्मीदवार के लिए अलग बैलेट बॉक्स

आज ईवीएम में उम्मीदवार के सामने मौजूद बटन दबाकर मतदान किया जाता है. लेकिन 1951-52 में व्यवस्था बिल्कुल अलग थी.

मतदान केंद्र पर उम्मीदवारों के नाम और चुनाव चिह्न लगे अलग-अलग बैलेट बॉक्स रखे जाते थे. मतदाता को मतपत्र दिया जाता था और उसे संबंधित उम्मीदवार के चिह्न वाले बॉक्स में डालना होता था.

यानी आज जिस चुनाव चिह्न को हम ईवीएम के बटन पर देखते हैं, पहले चुनाव में वही चिह्न मतदान केंद्र पर रखे बैलेट बॉक्स की पहचान में भी मदद करता था.

यह व्यवस्था खास तौर पर इसलिए बनाई गई थी ताकि कम पढ़े-लिखे या निरक्षर मतदाता भी उम्मीदवार की पहचान कर सकें.

इतने बड़े चुनाव के लिए कितने मतदान केंद्र बनाए गए?

पहले आम चुनाव के दौरान करीब 1.96 लाख मतदान केंद्र बनाए गए थे. इनमें हजारों मतदान केंद्र महिलाओं के लिए विशेष रूप से निर्धारित किए गए थे.

देश का भौगोलिक विस्तार भी बड़ी चुनौती था. कहीं पहाड़ थे, कहीं घने जंगल, कहीं रेगिस्तान और कहीं ऐसे इलाके जहां पहुंचना आसान नहीं था.

इसी वजह से चुनाव एक ही दिन में नहीं हुआ.

चुनाव कई चरणों में क्यों हुआ?

आज भी भारत में चुनाव कई चरणों में होते हैं, लेकिन 1951-52 में इसका कारण सिर्फ राजनीतिक या सुरक्षा व्यवस्था नहीं था. उस समय देश की भौगोलिक और परिवहन संबंधी परिस्थितियां बहुत अलग थीं.

कई इलाकों में मौसम ऐसा था कि वहां निर्धारित समय पर पहुंचना मुश्किल था. हिमाचल प्रदेश के कुछ इलाकों में बर्फबारी की समस्या को देखते हुए वहां मतदान पहले कराया गया.

पहले आम चुनाव की शुरुआत 25 अक्टूबर 1951 को हिमाचल प्रदेश के तत्कालीन चिनी क्षेत्र से हुई थी. चुनाव प्रक्रिया अलग-अलग इलाकों में अलग समय पर चली और 21 फरवरी 1952 तक पूरी हुई.

यानी भारत का पहला आम चुनाव वास्तव में एक लंबी चुनावी यात्रा थी, न कि एक दिन का मतदान.

पहले आम चुनाव में राजनीतिक मुकाबला आज के मुकाबले छोटा जरूर था, लेकिन देश की राजनीतिक विविधता पहले ही दिखाई देने लगी थी.

489 लोकसभा सीटों के लिए करीब 1,900 उम्मीदवार मैदान में थे. चुनाव में 53 राजनीतिक दलों और बड़ी संख्या में निर्दलीय उम्मीदवारों ने हिस्सा लिया.

यह वह दौर था जब आज की तरह कुछ बड़े राष्ट्रीय दलों का दबदबा पूरी तरह स्थापित नहीं हुआ था. कांग्रेस के अलावा समाजवादी, कम्युनिस्ट, किसान-मजदूर और अन्य राजनीतिक धाराएं भी चुनावी मैदान में थीं.

कांग्रेस की हुई बड़ी जीत

पहले आम चुनाव में जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस को स्पष्ट बहुमत मिला.

कांग्रेस ने 489 में से 364 सीटें जीतीं और करीब 45 प्रतिशत मत हासिल किए.

कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया को 16 सीटें मिलीं, जबकि सोशलिस्ट पार्टी ने 12 सीटें जीतीं. किसान मजदूर प्रजा पार्टी को 9 सीटें मिलीं.

नतीजे ने साफ कर दिया कि आजादी के बाद देश की पहली निर्वाचित सरकार का नेतृत्व जवाहरलाल नेहरू ही करेंगे.

हालांकि यह ध्यान रखना जरूरी है कि नेहरू इससे पहले ही अंतरिम सरकार के प्रधानमंत्री के रूप में काम कर रहे थे. इसलिए यह कहना अधिक सटीक है कि 1951-52 के चुनाव के बाद नेहरू के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार को लोकतांत्रिक जनादेश मिला.

10.59 करोड़ लोगों ने डाला वोट

पहले आम चुनाव में 17.32 करोड़ से अधिक मतदाता पंजीकृत थे. इनमें से 10,59,50,083 मतदाताओं ने मतदान किया.

उस समय के सामाजिक और आर्थिक हालात को देखते हुए यह भागीदारी अपने आप में बड़ी उपलब्धि थी.

यह सिर्फ मतदान का आंकड़ा नहीं था. यह इस बात का संकेत था कि भारत के आम नागरिक ने लोकतांत्रिक व्यवस्था को स्वीकार किया था.

महिलाओं की भागीदारी भी बनी बड़ी चुनौती

पहले चुनाव में महिलाओं के नाम मतदाता सूची में दर्ज करने को लेकर भी कई व्यावहारिक चुनौतियां सामने आईं.

कई जगह महिलाएं अपने नाम के बजाय किसी की पत्नी, बेटी या बहू के रूप में दर्ज थीं. चुनाव आयोग ने इस तरह की प्रविष्टियों को लेकर सुधार की प्रक्रिया शुरू की और महिलाओं की व्यक्तिगत पहचान के आधार पर नाम दर्ज करने पर जोर दिया.

यह छोटा प्रशासनिक बदलाव नहीं था. यह उस दौर के सामाजिक ढांचे में महिलाओं को स्वतंत्र राजनीतिक नागरिक के रूप में दर्ज करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था.

क्या पहला चुनाव पूरी तरह सफल रहा?

इतने बड़े लोकतांत्रिक प्रयोग में समस्याएं होना स्वाभाविक था.

मतदान की नई प्रक्रिया को समझाने से लेकर मतदाता सूची तैयार करने, मतदान केंद्रों तक पहुंचने, बैलेट बॉक्स बनाने और चुनाव सामग्री पहुंचाने तक अनेक चुनौतियां थीं.

कई इलाकों में मतदान की प्रक्रिया को लेकर लोगों को प्रशिक्षण और जागरूकता की जरूरत पड़ी. लेकिन इन कठिनाइयों के बावजूद चुनाव आयोग ने चुनाव प्रक्रिया को पूरा कराया और परिणाम घोषित हुए.

यही कारण है कि 1951-52 के चुनाव को केवल भारत का पहला चुनाव कहना उसके महत्व को कम करके देखना होगा. यह वास्तव में भारतीय लोकतंत्र की पहली बड़ी परीक्षा थी.

पहला चुनाव भारत के लिए इतना महत्वपूर्ण क्यों था?

आजादी के बाद दुनिया के कई लोगों को संदेह था कि इतने विशाल, गरीब और बड़े पैमाने पर निरक्षर समाज में लोकतंत्र कैसे काम करेगा.

भारत ने इसका जवाब किसी भाषण से नहीं, बल्कि चुनाव कराकर दिया.

17 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं का पंजीकरण, लाखों मतदान अधिकारियों की तैनाती, हजारों टन चुनाव सामग्री की व्यवस्था, दूरदराज के इलाकों तक पहुंच और करोड़ों लोगों का मतदान- यह सब उस समय हुआ जब देश में आज जैसी सड़क, रेल, संचार और तकनीकी सुविधाएं नहीं थीं.

भारत निर्वाचन आयोग आज भी 1951-52 के चुनावों को अपने चुनावी इतिहास के महत्वपूर्ण आधार के रूप में दर्ज करता है और पहले आम चुनाव की विस्तृत रिपोर्ट अपने प्रकाशनों में उपलब्ध कराता है.

पहला चुनाव सिर्फ सत्ता चुनने की प्रक्रिया नहीं था

1951-52 का चुनाव इस मायने में भी खास था कि उसने भारतीय लोकतंत्र की कुछ स्थायी परंपराओं की नींव रखी.

चुनाव चिह्न, मतदाता सूची, सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार, स्वतंत्र चुनाव आयोग, गुप्त मतदान और प्रतिनिधि सरकार जैसे सिद्धांतों को करोड़ों भारतीयों ने पहली बार बड़े पैमाने पर व्यवहार में देखा.

आज ईवीएम के सामने खड़े होकर कुछ सेकंड में वोट डाल देना बेहद सामान्य लगता है. लेकिन इसके पीछे सात दशक से ज्यादा लंबी वह यात्रा है, जिसकी शुरुआत उन दिनों हुई थी जब एक मतदान केंद्र में अलग-अलग उम्मीदवारों के नाम और प्रतीक वाले बैलेट बॉक्स रखे जाते थे.

भारत ने लोकतंत्र को सिर्फ अपनाया नहीं, उसे जमीन पर उतारा

भारत का पहला आम चुनाव 1951-52 में हुआ था. यह चुनाव उस समय हुआ जब देश के पास सीमित संसाधन थे, करोड़ों लोग निरक्षर थे और लोकतांत्रिक संस्थाएं बिल्कुल नई थीं.

फिर भी भारत ने अपने नागरिकों पर भरोसा किया.

17.32 करोड़ मतदाताओं का पंजीकरण, 489 लोकसभा सीटें, 401 निर्वाचन क्षेत्र, करीब 1.96 लाख मतदान केंद्र और 10.59 करोड़ से अधिक मतदाताओं का मतदान- ये आंकड़े सिर्फ इतिहास की किताब में दर्ज संख्या नहीं हैं. ये उस लोकतांत्रिक प्रयोग की तस्वीर हैं जिसने आगे चलकर भारत को दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र बनाने की नींव रखी.

और शायद यही पहले चुनाव की सबसे बड़ी कहानी है- भारत में लोकतंत्र किसी छोटे शिक्षित वर्ग के लिए नहीं, बल्कि आम नागरिक के हाथ में सौंपा गया था.