डोनाल्ड ट्रंप की ‘बोर्ड ऑफ पीस’ पर क्या है भारत का फैसला? पक्ष और विपक्ष में कितने देश

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा और इजरायल में शांति स्थापित करने के लिए बोर्ड ऑफ पीस नामक एक वैश्विक मंच गठित करने का फैसला लिया है. जिस पर भारत के रूख को समझना हर भारतीयों के लिए जरूरी है.

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Shanu Sharma

नई दिल्ली: इजरायल और गाजा के बीच चल रहे युद्ध को शांत कराने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक नई अंतरराष्ट्रीय पहल की शुरुआत की. इसके तहत बोर्ड ऑफ पीस नामक एक वैश्विक मंच गठित किया जा रहा है, जिसका उद्देश्य गाजा से जुड़े शांति प्रयासों को आगे बढ़ाना बताया जा रहा है. 

डोनाल्ड ट्रंप ने इस बोर्ड में शामिल होने के लिए दुनिया के करीब 50 देशों को निमंत्रण भेजा है. उनके द्वारा भेजे गए निमंत्रण पर कई देशों ने सहमति भी जता दी है. हालांकि कुछ देशों ने इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया है और वहीं कई देश अभी विचार की स्थिति में हैं.

क्या है भारत का रूख?

अमेरिकी राष्ट्रपति के इस निमंत्रण पर भारत की रूख की बात करें तो इधर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दी गई है. पीटीआई भाषा की रिपोर्ट के अनुसार, मामले से परिचित सूत्रों का कहना है कि भारत ने अभी बोर्ड ऑफ पीस में शामिल होने को लेकर अंतिम फैसला नहीं लिया है. बताया जा रहा है कि भारत इस पहल के विभिन्न पहलुओं पर गंभीरता से विचार कर रहा है, क्योंकि इससे जुड़े मुद्दे कूटनीतिक रूप से संवेदनशील हैं. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने इस बोर्ड में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी आमंत्रण भेजा है, लेकिन फिलहाल नई दिल्ली की ओर से कोई औपचारिक बयान सामने नहीं आया है.

क्या है यूरोप समेत अन्य देशों की राय?

बोर्ड ऑफ पीस को लेकर यूरोप के कुछ प्रमुख देशों ने दूरी बना ली है. फ्रांस, नॉर्वे और स्वीडन ने स्पष्ट रूप से इस पहल का हिस्सा बनने से इनकार कर दिया है. इन देशों का मानना है कि गाजा जैसे जटिल और लंबे समय से चले आ रहे संघर्ष के समाधान के लिए व्यापक अंतरराष्ट्रीय सहमति और संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाओं की भूमिका अहम होनी चाहिए. इसके अलावा कई देश ऐसे हैं, जिन्होंने न तो इस प्रस्ताव को स्वीकार किया है और न ही ठुकराया है. इस सूची में भारत के साथ-साथ ब्रिटेन, चीन, क्रोएशिया, इटली, यूरोपीय यूनियन की कार्यकारी शाखा, पराग्वे, रूस, सिंगापुर, स्लोवेनिया, तुर्किये और यूक्रेन जैसे देश शामिल हैं. इन देशों की चुप्पी से यह संकेत मिलता है कि वे अपने-अपने रणनीतिक और राजनीतिक हितों को ध्यान में रखते हुए अंतिम फैसला लेना चाहते हैं. पाकिस्तान ने भी बोर्ड ऑफ पीस का हिस्सा बनने पर सहमति जताई है.