गांधी की चिट्ठियों पर भी था अंग्रेजों का पहरा! ऐसे रखी जाती थी हर कदम पर नजर
ब्रिटिश शासन गांधी की राजनीतिक गतिविधियों के साथ उनके पत्राचार और संपर्कों पर भी नजर रखता था. सरकारी अभिलेखों में उनकी चिट्ठियों, कांग्रेस नेताओं से संवाद और हिरासत से जुड़ी कई गोपनीय फाइलें आज भी मौजूद हैं.
आजादी की लड़ाई को आमतौर पर आंदोलनों, गिरफ्तारियों, लाठियों और जेलों की कहानियों के रूप में याद किया जाता है. लेकिन ब्रिटिश शासन के खिलाफ चल रहे इस संघर्ष का एक दूसरा पहलू भी था, जो लंबे समय तक आम लोगों की नजर से दूर रहा. वह था अंग्रेजी सरकार का खुफिया तंत्र और नेताओं की गतिविधियों पर लगातार निगरानी.
महात्मा गांधी भी इस निगरानी से अलग नहीं थे. ब्रिटिश सरकार उनकी राजनीतिक गतिविधियों, कांग्रेस के नेताओं से संपर्क और पत्राचार को गंभीरता से देखती थी. ब्रिटिश दौर की सरकारी फाइलों में गांधी से जुड़े पत्राचार और राजनीतिक गतिविधियों पर तैयार की गई कई गोपनीय रिपोर्टें आज भी मौजूद हैं.
ब्रिटिश लाइब्रेरी में मौजूद भारत सरकार के गृह विभाग के रिकॉर्ड में गांधी और सविनय अवज्ञा आंदोलन से जुड़ी दर्जनों फाइलें हैं. इनमें कई फाइलों को उस समय 'Most Secret' यानी अत्यंत गोपनीय श्रेणी में रखा गया था.
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सिर्फ भाषण नहीं, संपर्कों पर भी थी नजर
ब्रिटिश सरकार की चिंता केवल यह जानने तक सीमित नहीं थी कि गांधी किसी सभा में क्या कह रहे हैं. वह यह भी समझना चाहती थी कि उनके संपर्क किन लोगों से हैं, कांग्रेस के भीतर क्या रणनीति बन रही है और उनके संदेशों का राजनीतिक असर कितना हो सकता है.
ब्रिटिश लाइब्रेरी के अभिलेखों में 1922 से 1946 के बीच गांधी और सविनय अवज्ञा आंदोलन से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड मौजूद हैं. इनमें गांधी से संबंधित 'Most Secret' पत्राचार, उनकी हिरासत की योजनाएं, कांग्रेस की गतिविधियों की समीक्षा और गांधी तथा कांग्रेस कार्यसमिति के बीच हुए पत्राचार से जुड़ी अलग-अलग फाइलें शामिल हैं.
इन दस्तावेजों से एक बात साफ होती है कि ब्रिटिश प्रशासन गांधी को केवल एक लोकप्रिय नेता के रूप में नहीं देख रहा था. उसकी नजर में गांधी की राजनीतिक गतिविधियां ब्रिटिश शासन के लिए गंभीर चुनौती थीं.
डाक को रोकने की ताकत भी सरकार के पास थी
ब्रिटिश भारत में डाक व्यवस्था पर सरकार के पास कानूनी अधिकार भी थे. Indian Post Office Act, 1898 की धारा 26 के तहत सार्वजनिक आपात स्थिति या सार्वजनिक सुरक्षा और शांति के हित में सरकार डाक सामग्री को रोकने या उसकी आवाजाही पर नियंत्रण का आदेश दे सकती थी.
1927 में ब्रिटिश संसद में भारत से संबंधित डाक सेंसरशिप पर सवाल पूछा गया था. तत्कालीन भारत मामलों के अवर सचिव ने संसद में स्पष्ट किया था कि इस कानून के तहत भारत में डाक सामग्री को रोका या रोका हुआ रखा जा सकता था. खास बात यह है कि उन्होंने यह भी कहा था कि यह अधिकार सामान्य परिस्थितियों में भी कानून के तहत मौजूद था.
इससे पता चलता है कि औपनिवेशिक शासन के पास पत्राचार की निगरानी और डाक को रोकने का कानूनी ढांचा मौजूद था.
लेकिन यहां एक जरूरी फर्क समझना चाहिए. इसका अर्थ यह नहीं है कि गांधी की हर चिट्ठी नियमित रूप से खोली जाती थी. उपलब्ध दस्तावेज यह दिखाते हैं कि विशेष परिस्थितियों में उनके पत्राचार और राजनीतिक संपर्कों पर सरकारी नियंत्रण और निगरानी की जाती थी.
1942 में गांधी के एक पत्र को आगे भेजने से भी इनकार
इस निगरानी का एक स्पष्ट उदाहरण 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय मिलता है. भारत छोड़ो आंदोलन के बाद गांधी को हिरासत में रखा गया था. इसी दौरान गांधी ने मोहम्मद अली जिन्ना को एक छोटा पत्र भेजने की इच्छा जताई था, जिसमें उनसे मुलाकात की इच्छा व्यक्त की गई थी. ब्रिटिश ने यह पत्र आगे भेजने की अनुमति नहीं दी.
ब्रिटेन के नेशनल आर्काइव्स में सुरक्षित 24 मई 1942 के एक सरकारी संदेश में दर्ज है कि भारत सरकार ने गांधी के जिन्ना को भेजे जाने वाले पत्र को आगे भेजने से इनकार कर दिया था. वजह यह बताई गई कि हिरासत में रखे गए ऐसे व्यक्ति को राजनीतिक पत्राचार या संपर्क की सुविधा देना सरकार की उस समय की नीति के अनुरूप नहीं था.
यह छोटा-सा दस्तावेज उस दौर की सरकारी सोच को समझने के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. गांधी जेल में थे, लेकिन सरकार को डर था कि उनके राजनीतिक संपर्क बाहर की राजनीति को प्रभावित कर सकते हैं.
1942 के बाद निगरानी और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई
अगस्त 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू होने के बाद ब्रिटिश सरकार ने कांग्रेस के शीर्ष नेताओं को गिरफ्तार कर लिया था. गांधी भी हिरासत में लिए गए. इसके बाद उनके पत्रों और कांग्रेस के अन्य नेताओं के साथ संपर्क से संबंधित कई सरकारी रिकॉर्ड तैयार हुए.
ब्रिटिश लाइब्रेरी की फाइलों में 1942 की एक “Most Secret” फाइल गांधी और कांग्रेस की योजनाओं से संबंधित है. दूसरी फाइल में 23 सितंबर 1942 के गांधी के एक पत्र से संबंधित सरकारी रिकॉर्ड दर्ज है. इसके अलावा गांधी और कांग्रेस कार्यसमिति के पत्राचार पर भी अलग-अलग गोपनीय फाइलें बनाई गई थीं.
1943-44 के रिकॉर्ड में तो गांधी की निजी पत्राचार संबंधी फाइल भी मौजूद है, जिसे “Most Secret” श्रेणी में दर्ज किया गया था.
यानी गांधी की गतिविधियों पर नजर केवल पुलिस की निगरानी तक सीमित नहीं थी. उनके राजनीतिक संपर्क और पत्राचार भी सरकारी रिकॉर्ड का हिस्सा बन रहे थे.
अंग्रेजों को गांधी से इतनी चिंता क्यों थी?
इसका सबसे बड़ा कारण गांधी का जनसंपर्क और उनकी राजनीतिक पहुंच थी.
गांधी के पास कोई सरकारी पद नहीं था, लेकिन देश के अलग-अलग हिस्सों में उनके संदेश का व्यापक प्रभाव था. वह पत्र लिखते थे, नेताओं से संपर्क करते थे, जनता से संवाद करते थे और आंदोलनों के लिए दिशा तय करते थे.
ब्रिटिश प्रशासन के लिए समस्या यह थी कि गांधी को जेल में डालना हमेशा उनके राजनीतिक प्रभाव को खत्म नहीं करता था.
यही वजह है कि सरकार के लिए यह जानना महत्वपूर्ण था कि गांधी जेल से क्या संदेश दे रहे हैं, किससे संपर्क करना चाहते हैं और उनके संदेश का आंदोलन पर क्या असर पड़ सकता है.
खुफिया तंत्र का असली उद्देश्य क्या था?
ब्रिटिश खुफिया व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य राजनीतिक गतिविधियों की जानकारी जुटाना था. सरकारी रिकॉर्ड में गांधी के साथ-साथ कांग्रेस, उसके नेताओं और सविनय अवज्ञा आंदोलन से संबंधित गतिविधियों पर भी नजर रखने के प्रमाण मिलते हैं. ब्रिटिश लाइब्रेरी के रिकॉर्ड में गांधी से जुड़ी सरकारी फाइलों की पूरी श्रृंखला इस निगरानी की व्यापकता दिखाती है.
इस तरह के रिकॉर्ड से यह भी पता चलता है कि ब्रिटिश प्रशासन आंदोलनों को केवल सड़कों पर होने वाली भीड़ के रूप में नहीं देखता था. वह उसके पीछे चल रहे संपर्क, संगठन और नेतृत्व की गतिविधियों को भी समझने की कोशिश करता था.
आज इन फाइलों की अहमियत क्यों है?
आजादी के बाद इन दस्तावेजों का महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि वे स्वतंत्रता आंदोलन को केवल नेताओं की आत्मकथाओं या अखबारों की खबरों से नहीं, बल्कि औपनिवेशिक सरकार की अपनी नजर से समझने का मौका देते हैं.
जब किसी सरकारी फाइल पर 'Most Secret' लिखा मिलता है और उसमें गांधी के पत्राचार, कांग्रेस की योजनाओं या उनकी हिरासत से जुड़ी जानकारी दर्ज होती है, तो यह उस समय ब्रिटिश प्रशासन की प्राथमिकताओं की झलक देता है. इतिहासकारों के लिए ऐसे रिकॉर्ड इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि इनमें सरकार की चिंताएं, निर्णय और रणनीति दर्ज होती थी.
गांधी को रोकने की कोशिश, लेकिन विचारों को नहीं रोक सके
ब्रिटिश सरकार गांधी को गिरफ्तार कर सकती थी. उनके राजनीतिक संपर्कों को सीमित कर सकती थी. कुछ पत्रों को रोक सकती थी और उनके आंदोलनों पर खुफिया रिपोर्ट तैयार कर सकती थी.
लेकिन गांधी के विचारों और उनके संदेश की पहुंच को पूरी तरह रोकना आसान नहीं था. यही स्वतंत्रता आंदोलन की सबसे दिलचस्प बातों में से एक है. एक तरफ औपनिवेशिक सरकार के पास पुलिस, जेल, कानून और खुफिया तंत्र था, तो दूसरी तरफ भारतीय नेताओं के पास जनता के बीच लगातार संवाद का रास्ता था.
गांधी की कहानी इसी संघर्ष का एक उदाहरण है. अंग्रेज उनके पत्रों और संपर्कों पर नजर रख सकते थे, लेकिन उस राजनीतिक चेतना पर पूरी तरह पहरा नहीं लगा सके जो देश के अलग-अलग हिस्सों में फैल रही थी.