ये हमारा काम नहीं, केंद्र की जिम्मेदारी है... बीजेपी नेता को सुप्रीम कोर्ट ने क्यों सुनाई खरी-खोटी

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि आधार कार्ड के दुरुपयोग का मुद्दा गंभीर हो सकता है, लेकिन इसकी जांच के लिए विस्तृत प्रशासनिक तंत्र और नीति संबंधी निर्णयों की आवश्यकता होती है.

Anuj

नई दिल्ली: चीफ ऑफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने आधार कार्ड के कथित गलत इस्तेमाल या धोखाधड़ी से जारी किए जाने के आरोपों पर महत्वपूर्ण टिप्पणी की है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों की जांच न्यायालय का काम नहीं है.

अदालत ने स्पष्ट किया कि इस तरह के आरोपों की पड़ताल और आवश्यक कार्रवाई करना केंद्र सरकार की जिम्मेदारी है, क्योंकि इसके लिए व्यापक जांच और नीतिगत निर्णय की जरूरत होती है. मुख्य न्यायाधीश के साथ इस पीठ में जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस विपुल एम पंचोली भी शामिल थे.

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

पीठ पश्चिम बंगाल में चल रही मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) प्रक्रिया से जुड़े मामले की सुनवाई कर रही थी. इसी दौरान राज्य में रोहिंग्या शरणार्थियों को कथित रूप से फर्जी आधार कार्ड जारी किए जाने के आरोप उठाए गए थे.

'आधार कार्ड के दुरुपयोग का मुद्दा गंभीर'

सुनवाई के दौरान अदालत ने कहा कि आधार कार्ड के दुरुपयोग का मुद्दा गंभीर हो सकता है, लेकिन इसकी जांच के लिए विस्तृत प्रशासनिक तंत्र और नीति संबंधी निर्णयों की आवश्यकता होती है. इसलिए यह मामला न्यायालय के बजाय कार्यपालिका के दायरे में आता है। पीठ ने संकेत दिया कि यदि किसी को आधार जारी करने की प्रक्रिया या उसके दुरुपयोग पर आपत्ति है, तो उसे केंद्र सरकार के समक्ष उठाया जाना चाहिए.

बीजेपी नेता अश्विनी उपाध्याय ने उठाया मुद्दा

यह मामला बीजेपी नेता और अधिवक्ता अश्विनी उपाध्याय द्वारा उठाया गया था. उन्होंने अदालत से मतदाता सूची के पुनरीक्षण में आधार कार्ड को स्वीकार करने से संबंधित पहले दिए गए निर्देशों पर अतिरिक्त स्पष्टता मांगी थी. उपाध्याय ने आरोप लगाया था कि पश्चिम बंगाल में विशेष रूप से रोहिंग्या समुदाय के लोगों को धोखाधड़ी के माध्यम से आधार कार्ड जारी किए जा रहे हैं.

'आधार की भूमिका पहचान तक सीमित है'

सुनवाई के दौरान जस्टिस बागची ने यह भी कहा कि आधार कार्ड मूल रूप से पहचान के प्रमाण के रूप में बनाया गया दस्तावेज है. उन्होंने कहा कि यदि बड़े पैमाने पर इसके दुरुपयोग के आरोप हैं, तो उन्हें कानूनी रूप से विनियमित करने की जरूरत है, लेकिन आधार पर नागरिकता का पता लगाने का कोई सवाल ही नहीं है. अदालत ने जोर देकर कहा कि आधार की भूमिका पहचान तक सीमित है और इसे नागरिकता निर्धारण के साथ नहीं जोड़ा जा सकता.

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने भी कहा कि ऐसे आरोपों की गहराई से जांच जरूरी है, लेकिन इसके लिए अदालत उपयुक्त मंच नहीं है. उन्होंने दोहराया कि इस तरह के मामलों में कार्रवाई और नीति निर्माण की जिम्मेदारी सरकार पर ही है.

क्या है पूरा मामला

इस मामले की पृष्ठभूमि सितंबर 2025 के उस आदेश से जुड़ी है, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग को मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में पहचान प्रमाण के तौर पर आधार कार्ड स्वीकार करने की अनुमति दी थी. अदालत ने तब कहा था कि प्रतिनिधित्व अधिनियम, 1950 की धारा 23(4) के तहत आधार को पहचान के दस्तावेजों में शामिल किया जा सकता है. हालांकि, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया था कि अधिकारियों को आधार की सत्यता जांचने और अतिरिक्त दस्तावेज मांगने का अधिकार रहेगा.