भारत ने रचा रक्षा इतिहास! DRDO-आजाद इंजीनियरिंग ने सौंपा पहला स्वदेशी टर्बोजेट इंजन, मिसाइल और ड्रोन को मिलेगी नई ताकत

DRDO और आजाद इंजीनियरिंग ने देश का पहला 350 किलोग्राम थ्रस्ट श्रेणी का स्वदेशी एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन तैयार किया है, जिससे भारत की रक्षा आत्मनिर्भरता और एयरोस्पेस क्षमता मजबूत होगी.

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Sagar Bhardwaj

रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) ने स्वदेशी रक्षा तकनीक के क्षेत्र में एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है. DRDO की गैस टर्बाइन रिसर्च एस्टैब्लिशमेंट (GTRE) द्वारा डिजाइन किए गए देश के पहले 350 किलोग्राम थ्रस्ट श्रेणी के एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन की पहली उत्पादन इकाई आजाद इंजीनियरिंग ने सफलतापूर्वक GTRE को सौंप दी है. इस उपलब्धि के साथ भारत उन चुनिंदा देशों की श्रेणी में शामिल हो गया है, जिनके पास ऐसे कॉम्पैक्ट सैन्य टर्बोजेट इंजन को स्वदेशी रूप से डिजाइन और विकसित करने की क्षमता है.

क्रूज मिसाइल और हाई-स्पीड ड्रोन को मिलेगी नई शक्ति

यह कॉम्पैक्ट टर्बोजेट इंजन मुख्य रूप से सिंगल-यूज सैन्य प्लेटफॉर्म के लिए विकसित किया गया है. इसका उपयोग अगली पीढ़ी की क्रूज मिसाइलों, जेट-संचालित लोइटरिंग म्यूनिशन, हाई-स्पीड टारगेट ड्रोन और मानवरहित हवाई वाहनों (UAV) में किया जाएगा. रक्षा विशेषज्ञों के अनुसार, इस तकनीक के आने से भारत के स्वदेशी हथियारों की मारक क्षमता, गति और परिचालन दक्षता में महत्वपूर्ण बढ़ोतरी होगी.

आयात पर निर्भरता होगी कम, बढ़ेगी रणनीतिक ताकत

अब तक भारत इस श्रेणी के कॉम्पैक्ट जेट इंजनों के लिए काफी हद तक विदेशी तकनीक और आयात पर निर्भर था. स्वदेशी इंजन के विकास से भविष्य में हथियार प्रणालियों के निर्माण में बाहरी आपूर्ति या तकनीकी प्रतिबंधों का जोखिम कम होगा. यह इंजन लंबी दूरी की लैंड अटैक क्रूज मिसाइलों और हाई-स्पीड कामिकाजे ड्रोन को अधिक प्रभावी बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है. जेट इंजन से लैस ड्रोन 400 से 450 किलोमीटर प्रति घंटे से अधिक की गति प्राप्त कर सकते हैं, जिससे दुश्मन के प्रतिक्रिया देने का समय काफी घट जाएगा.


फाइटर जेट इंजन से अलग है इसकी तकनीक

यह इंजन पारंपरिक लड़ाकू विमान इंजनों से अलग अवधारणा पर आधारित है. जहां फाइटर जेट इंजन हजारों घंटे तक लगातार सेवा देने के लिए बनाए जाते हैं, वहीं एक्सपेंडेबल टर्बोजेट इंजन केवल एक मिशन के लिए डिजाइन किया जाता है. लक्ष्य तक हथियार पहुंचाने के बाद यह उसी के साथ नष्ट हो जाता है. इसलिए इसके निर्माण में कम लागत, उच्च विश्वसनीयता, कॉम्पैक्ट आकार और सरल डिजाइन को प्राथमिकता दी गई है.

आत्मनिर्भर भारत की दिशा में मजबूत कदम

नीति एवं प्रौद्योगिकी विशेषज्ञ तथा डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम के पूर्व सलाहकार सिजन पाल सिंह के अनुसार, यह उपलब्धि केवल एक इंजन के निर्माण तक सीमित नहीं है, बल्कि भविष्य के उन्नत एरो-इंजन विकास की मजबूत नींव भी रखती है. कंप्रेसर, टर्बाइन और कंबशन सिस्टम जैसी जटिल तकनीकों में हासिल अनुभव भविष्य में अधिक क्षमता वाले फाइटर जेट इंजनों के विकास में सहायक होगा. अमेरिका, रूस, फ्रांस, ब्रिटेन और चीन जैसे देशों के बाद भारत का इस क्षेत्र में शामिल होना रक्षा आत्मनिर्भरता और स्वदेशी एयरोस्पेस इकोसिस्टम के लिए एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जा रहा है.