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India Daily

क्या शेख हसीना को बांग्लादेश को सौंपने के लिए मजबूर है भारत, जानें प्रत्यर्पण पर क्या कहती है संधि?

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के प्रत्यर्पण अनुरोध पर भारत कानूनी और संधि प्रावधानों की समीक्षा कर रहा है. भारतीय कानून और द्विपक्षीय संधि राजनीतिक उद्देश्य या अन्य आधारों पर अनुरोध ठुकराने का अधिकार देती है.

Kuldeep Sharma
Edited By: Kuldeep Sharma
क्या शेख हसीना को बांग्लादेश को सौंपने के लिए मजबूर है भारत, जानें प्रत्यर्पण पर क्या कहती है संधि?
Courtesy: social media

नई दिल्ली: बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना को इंटरनेशनल क्राइम्स ट्रिब्यूनल (ICT) द्वारा मौत की सजा सुनाए जाने के बाद ढाका ने भारत से उनका औपचारिक प्रत्यर्पण मांगा है. मामला राजनीतिक रूप से बेहद संवेदनशील है, इसलिए यह सवाल उठ रहा है कि क्या भारत कानूनी तौर पर इस अनुरोध को अस्वीकार कर सकता है. 

हालांकि भारत ने स्पष्ट किया है कि यह पूरी तरह 'कानूनी और न्यायिक प्रक्रिया' है और दोनों देशों के बीच औपचारिक बातचीत के बाद ही कोई फैसला होगा. वर्तमान में भारत पूरे अनुरोध की विस्तृत समीक्षा कर रहा है.

विशेषज्ञों का क्या कहना है

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि प्रत्यर्पण संधियां न्याय के हित में निभाई जाती हैं, फिर भी भारतीय कानून और भारत–बांग्लादेश संधि भारत को पर्याप्त अधिकार देती है. यदि किसी अनुरोध में राजनीतिक बदले की भावना, निष्पक्ष सुनवाई की कमी या शक्ति के दुरुपयोग के संकेत मिलते हैं, तो भारत इसे ठुकरा सकता है. विशेषज्ञ यह भी बताते हैं कि ICT के फैसलों और उनकी प्रक्रिया पर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहले से सवाल उठे हैं, जो भारत के निर्णय को प्रभावित कर सकते हैं.

क्या कहते हैं भारत के प्रत्यर्पण कानून

भारत के Extradition Act, 1962 के अनुसार केंद्र सरकार को प्रत्यर्पण रोकने, प्रक्रिया स्थगित करने या आरोपी को मुक्त करने तक की पूर्ण शक्ति प्राप्त है. धारा 29 यह स्पष्ट करती है कि यदि अनुरोध तुच्छ लगे, राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित हो या न्याय के हित में न हो, तो भारत उसे अस्वीकार कर सकता है. इसके अतिरिक्त, केंद्र सरकार किसी भी समय वारंट रद्द करने या आरोपी को राहत देने का अधिकार रखती है. यह प्रावधान भारत के लिए व्यापक लचीलापन तैयार करते हैं.

कब पूरी तरह रुक जाता है प्रत्यर्पण

धारा 31 यह निर्धारित करती है कि किन स्थितियों में प्रत्यर्पण पूरी तरह प्रतिबंधित हो जाता है. यदि आरोप राजनीतिक प्रकृति का हो या आरोपी यह साबित कर दे कि उसे राजनीतिक कारणों से निशाना बनाया जा रहा है, तो भारत प्रत्यर्पण नहीं कर सकता. यदि मुकदमे की समयावधि समाप्त हो चुकी हो या संधि आरोपी को अन्य आरोपों में अभियोजन से सुरक्षा नहीं देती, तो अनुरोध स्वतः खारिज समझा जाता है. यह धारा शेख हसीना के मामले को और जटिल बनाती है.

भारत–बांग्लादेश संधि क्या अनुमति देती है

द्विपक्षीय संधि के अनुच्छेद 6 के अनुसार राजनीतिक अपराधों में प्रत्यर्पण से इनकार किया जा सकता है, हालांकि हत्या, आतंकवाद, विस्फोटक, हथियार अपराध, अपहरण और गंभीर हिंसा को राजनीतिक अपराध नहीं माना जाएगा. अनुच्छेद 7 भारत को यह अधिकार देता है कि वह चाहे तो स्वयं आरोपी के खिलाफ मुकदमा चला सकता है. अनुच्छेद 8 बताता है कि यदि आरोप तुच्छ हो, समय बीत चुका हो या अनुरोध दुर्भावनापूर्ण लगे, तो प्रत्यर्पण से इनकार अनिवार्य है. संधि भारत को निर्णय में पूरी स्वतंत्रता देती है.

फिलहाल प्रक्रिया कहां पहुंची है

बांग्लादेश ने शेख हसीना का औपचारिक प्रत्यर्पण अनुरोध भेज दिया है और भारत इस पर अपने कानूनों और संधि के प्रावधानों के आधार पर विचार कर रहा है. विदेश सचिव के अनुसार दोनों देशों के बीच चर्चा जारी रहेगी. ICT के फैसले को लेकर पहले से उठ रहे सवाल, राजनीतिक वातावरण और निष्पक्ष सुनवाई को लेकर चिंताएं भी भारत की समीक्षा का हिस्सा होंगी. अंतिम निर्णय इस पर निर्भर करेगा कि क्या अनुरोध न्यायसंगत है या भारतीय कानून में वर्णित अस्वीकार के दायरे में आता है.