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ममता बनर्जी की पार्टी के नेता मुकुल रॉय की विधानसभा सदस्यता रद्द, हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

कलकत्ता हाई कोर्ट ने गुरुवार को टीएमसी नेता मुकुल रॉय की पश्चिम बंगाल विधानसभा सदस्यता रद्द कर दी. अदालत ने यह फैसला एंटी-डिफेक्शन कानून के तहत सुनाया है.

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Kuldeep Sharma

कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजनीति में बड़ा झटका देते हुए कोलकाता हाईकोर्ट ने टीएमसी नेता और कृष्णानगर उत्तर सीट से विधायक मुकुल रॉय को दल-बदल के आरोपों में अयोग्य घोषित कर दिया है. 

न्यायमूर्ति देबांगसु बसाक और न्यायमूर्ति मोहम्मद शब्बार राशिदी की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा कि रॉय का दल-बदल साबित हो चुका है. अदालत ने विधानसभा स्पीकर बिमान बनर्जी के फैसले को भी पक्षपातपूर्ण बताते हुए खारिज कर दिया है, जिससे बंगाल की सियासत में हलचल मच गई है.

पूर्व फैसलों को भी किया रद्द

हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा कि मुकुल रॉय का दल-बदल साबित हुआ है, इसलिए उन्हें विधायक पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है. अदालत ने न केवल अयोग्यता का आदेश दिया, बल्कि विधानसभा के स्पीकर बिमान बनर्जी द्वारा दिए गए पूर्व निर्णय को भी रद्द कर दिया. कोर्ट ने माना कि स्पीकर ने मामले में निर्णय देने में अनावश्यक देरी की और पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया.

मुकुल रॉय का राजनीतिक सफर

मुकुल रॉय का राजनीतिक जीवन हमेशा से चर्चा में रहा है. नवंबर 2017 में उन्होंने तृणमूल कांग्रेस छोड़कर भाजपा का दामन थामा था. भाजपा में उन्हें राष्ट्रीय उपाध्यक्ष का पद भी मिला. 2021 के विधानसभा चुनाव में वे कृष्णानगर उत्तर से भाजपा के टिकट पर जीते, लेकिन चुनावों के बाद अचानक तृणमूल कांग्रेस में लौट आए. इस कदम ने उनकी निष्ठा पर सवाल उठाए, जो अब अदालत के फैसले से और मजबूत हो गए हैं.

सुवेंदु अधिकारी ने फैसले को बताया ऐतिहासिक

राज्य विधानसभा में विपक्ष के नेता सुवेंदु अधिकारी ने इस फैसले का स्वागत किया है. उन्होंने कहा कि यह वही याचिका है जो उन्होंने विपक्ष के नेता के रूप में दायर की थी. अधिकारी ने कहा, 'यह ऐतिहासिक फैसला है. अदालत ने न केवल मुकुल रॉय को अयोग्य ठहराया, बल्कि स्पीकर के पक्षपाती रवैये को भी उजागर किया है. देर भले ही हुई हो, लेकिन संविधान और लोकतंत्र की जीत हुई है.'

राजनीतिक असर और सियासी हलचल

इस फैसले के बाद पश्चिम बंगाल की सियासत में नई हलचल देखने को मिल रही है. राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में दल-बदल के मामलों पर सख्त मिसाल बनेगा. तृणमूल कांग्रेस अभी इस पर आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं दे पाई है, जबकि भाजपा इस फैसले को अपनी नैतिक जीत के रूप में देख रही है. आने वाले दिनों में यह मामला बंगाल के राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है.