क्या है ब्रिक्स? गोल्डमैन सेक्स के एक शब्द से कैसे अस्तित्व में आया यह शक्तिशाली संगठन

18वें ब्रिक्स सम्मेलन की मेजबानी नई दिल्ली कर रहा है. जानिए कैसे गोल्डमैन सेक्स के एक शब्द से शुरू हुआ यह समूह 11 देशों का शक्तिशाली वैश्विक आर्थिक मंच बन गया.

@airnewsalerts
Sagar Bhardwaj

भारत 12 और 13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली के भारत मंडपम में 18वें ब्रिक्स (BRICS) शिखर सम्मेलन की मेजबानी कर रहा है. 1 जनवरी 2026 को भारत ने चौथी बार इस समूह की अध्यक्षता संभाली थी. यह सम्मेलन ऐसे समय में हो रहा है जब ब्रिक्स चार देशों के एक छोटे से विचार से उभरकर 11 पूर्ण सदस्यों और कई भागीदार देशों वाले एक विशाल वैश्विक मंच का रूप ले चुका है. आज यह संगठन दुनिया की एक-चौथाई से अधिक अर्थव्यवस्था और लगभग आधी आबादी का प्रतिनिधित्व करता है.

क्या है ब्रिक्स और इसके मुख्य उद्देश्य?

ब्रिक्स 'ग्लोबल साउथ' (विकासशील और उभरते देशों) के लिए एक राजनीतिक और कूटनीतिक समन्वय मंच है. इसका मुख्य उद्देश्य सदस्य देशों के बीच आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक सहयोग को मजबूत करना है. इसके साथ ही यह संगठन संयुक्त राष्ट्र (UN), अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन (WTO) जैसे वैश्विक संस्थानों में सुधार लाकर विकासशील देशों की आवाज को बुलंद करना चाहता है. यह संयुक्त राष्ट्र की तरह कोई औपचारिक बहुपक्षीय संगठन नहीं है, बल्कि एक अनौपचारिक समूह है जहां फैसले सर्वसम्मति से लिए जाते हैं.


 गोल्डमैन सेक्स के रिसर्च पेपर से हुई शुरुआत

ब्रिक्स की कहानी वर्ष 2001 में शुरू हुई, जब वित्तीय सेवा कंपनी 'गोल्डमैन सेक्स' के अर्थशास्त्री जिम ओ'नील ने एक शोध पत्र में "BRIC" (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) शब्द गढ़ा. उनका तर्क था कि ये चार उभरती अर्थव्यवस्थाएं भविष्य में वैश्विक अर्थव्यवस्था का नेतृत्व करेंगी. जल्द ही इन चारों देशों की सरकारों ने इस अवधारणा को अपना लिया और अंतरराष्ट्रीय मामलों में एक एकजुट मंच पेश करने के उद्देश्य से आपस में सहयोग शुरू किया.

राजनीतिक मंच में तब्दील होने का सफर

रूस ने इस आर्थिक विचार को सरकारी स्तर के समूह में बदलने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. वर्ष 2006 में संयुक्त राष्ट्र महासभा के इतर BRIC देशों के विदेश मंत्रियों की पहली औपचारिक बैठक हुई. इसके बाद 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट ने इन चारों देशों को और करीब ला दिया. 16 जून 2009 को रूस के येकातेरिनबर्ग में पहला नेता-स्तरीय शिखर सम्मेलन आयोजित हुआ, जिसमें विश्व वित्तीय संस्थानों में सुधार की मांग उठाई गई.

दक्षिण अफ्रीका का प्रवेश और 'BRIC' से 'BRICS' बनना

वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका को इस समूह में शामिल होने का निमंत्रण दिया गया. 2011 में चीन में आयोजित सम्मेलन में दक्षिण अफ्रीका के आधिकारिक तौर पर शामिल होने के बाद इस समूह का नाम बदलकर 'BRICS' हो गया. दक्षिण अफ्रीका के आने से अफ्रीका महाद्वीप में इस संगठन की पहुंच का विस्तार हुआ. इसके बाद, सदस्यों ने 2014 में 'न्यू डेवलपमेंट बैंक' (NDB) और आपातकालीन नकद आरक्षित व्यवस्था (Contingent Reserve Arrangement) की स्थापना की, जिससे पश्चिमी वित्तीय प्रणालियों पर निर्भरता कम की जा सके.

वैश्विक तनाव और डॉलर से दूरी बनाने की पहल

हाल के वर्षों में भू-राजनीतिक तनावों और प्रतिबंधों के कारण ब्रिक्स देशों ने अमेरिकी डॉलर के विकल्प तलाशने और स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने पर जोर दिया. पश्चिमी देशों द्वारा रूस पर लगाए गए वित्तीय प्रतिबंधों और अमेरिकी डॉलर की बढ़ती कीमतों ने विकासशील देशों को अपनी आर्थिक सुरक्षा के लिए वैकल्पिक बैंकिंग नेटवर्क और वित्तीय सुरक्षा घेरा बनाने के लिए प्रेरित किया.

 2023 से 2025 तक का ऐतिहासिक विस्तार

अगस्त 2023 के जोहान्सबर्ग सम्मेलन में ब्रिक्स का अभूतपूर्व विस्तार हुआ. जनवरी 2024 में मिस्र, इथियोपिया, ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) इसके पूर्ण सदस्य बने. इसके बाद जनवरी 2025 में इंडोनेशिया इस संगठन का 11वां पूर्ण सदस्य बना. 2024 के कजान सम्मेलन में 'पार्टनर कंट्री' (भागीदार देश) की एक नई श्रेणी भी बनाई गई, जिसमें मलेशिया, थाईलैंड, वियतनाम, बेलारूस और नाइजीरिया जैसे कई देशों को शामिल किया गया.

आंतरिक विविधताएं और कूटनीतिक चुनौतियां

सदस्यों की संख्या बढ़ने के साथ ब्रिक्स के सामने अलग-अलग राष्ट्रीय हितों को साधने की चुनौती भी आई है. जहां चीन और रूस इसे अक्सर पश्चिमी प्रभुत्व के खिलाफ एक शक्ति संतुलन के रूप में देखते हैं, वहीं भारत और ब्राजील इसे मुख्य रूप से आर्थिक विकास और विकासशील देशों के सहयोग के साधन के रूप में देखते हैं. इसके अलावा, ईरान-सऊदी अरब या मिस्र-इथियोपिया जैसे सदस्यों के बीच क्षेत्रीय प्रतिद्वंद्विताएं भी मौजूद हैं, लेकिन इसके बावजूद संगठन सर्वसम्मति के नियम पर काम करता है.

 भारत के लिए ब्रिक्स का कूटनीतिक महत्व

नई दिल्ली सम्मेलन भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' (Strategic Autonomy) की नीति को प्रदर्शित करता है. भारत एक तरफ जहां अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ 'क्वाड' (Quad) का हिस्सा है, वहीं दूसरी तरफ रूस और चीन के साथ ब्रिक्स और एससीओ में शामिल है. यह नीति भारत को किसी एक गुट में शामिल हुए बिना वैश्विक मंच पर संतुलन बनाए रखने की सुविधा देती है.

चीन के साथ संबंधों का संतुलन

द्विपक्षीय सीमा विवादों के बावजूद, ब्रिक्स भारत और चीन को एक ऐसा बहुपक्षीय मंच प्रदान करता है जहां दोनों देश स्थानीय मुद्रा में व्यापार और जलवायु वित्त पोषण जैसे साझा मुद्दों पर बातचीत कर सकते हैं. भारत लगातार यह सुनिश्चित करता है कि ब्रिक्स को पश्चिमी विरोधी मंच बनने के बजाय एक रचनात्मक और सुधारवादी संगठन के रूप में आगे बढ़ाया जाए. 2001 का एक आर्थिक शब्द आज 2026 में 11 सदस्यों वाला एक मजबूत वैश्विक गठबंधन बन चुका है.