BRICS Summit 2026: कांग्रेस में अलग-अलग राय, थरूर ने गिनाए फायदे तो चिदंबरम ने उठाए सवाल

BRICS Summit से पहले कांग्रेस के नेताओं की राय अलग-अलग नजर आ रही है. वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने जहां BRICS को भारत के लिए महत्वपूर्ण बताया. वहीं, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने पिछले BRICS सम्मेलनों से मिलने वाले ठोस फायदे पर सवाल उठाए हैं.

AI Generated
Shilpa Srivastava

BRICS Summit 2026: नई दिल्ली में 12 और 13 सितंबर को 18वें BRICS Summit 2026 का आयोजन होने जा रहा है. रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन भारत पहुंच चुके हैं, जबकि चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग 12 सितंबर को दिल्ली पहुंचेंगे. सम्मेलन को लेकर देश और दुनिया की नजर भारत पर है. BRICS को लेकर कांग्रेस में अलग-अलग राय चल रही हैं.

BRICS Summit से पहले कांग्रेस के नेताओं की राय अलग-अलग नजर आ रही है. वरिष्ठ नेता शशि थरूर ने जहां BRICS को भारत के लिए महत्वपूर्ण बताया. वहीं, पूर्व वित्त मंत्री पी. चिदंबरम ने पिछले BRICS सम्मेलनों से मिलने वाले ठोस फायदे पर सवाल उठाए हैं.

शशि थरूर ने बताया बड़ा फायदा:

शशि थरूर के अनुसार BRICS ग्लोबल साउथ के देशों के लिए एक महत्वपूर्ण मंच है. उन्होंने कहा कि BRICS के 11 सदस्य देश दुनिया की बड़ी आबादी और वैश्विक GDP के करीब 41 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं. थरूर ने भारत द्वारा इस सम्मेलन की मेजबानी को देश के लिए सम्मान की बात बताया. उनके मुताबिक कई राष्ट्राध्यक्षों और सरकारों के प्रमुखों का भारत आना देश की कूटनीतिक ताकत को दिखाता है.


चिदंबरम ने उठाए सवाल:

वहीं, पी. चिदंबरम ने BRICS की उपयोगिता पर सवाल उठाते हुए कहा कि पिछले दो-तीन सम्मेलनों से उन्हें कोई खास ठोस फायदा या परिणाम दिखाई नहीं देता. उनके बयान पर बीजेपी ने भी प्रतिक्रिया दी है. बीजेपी ने कांग्रेस नेता पर भारत की प्रगति को लेकर नकारात्मक रवैया रखने का आरोप लगाया.

BRICS के सामने बड़ी चुनौती:

शशि थरूर ने यह भी माना कि BRICS के सामने कई चुनौतियां हैं. सबसे बड़ी चुनौती सभी सदस्य देशों के बीच साझा सहमति बनाना है. अलग-अलग देशों के अपने हित और विचार हैं, जिसके कारण वैश्विक मुद्दों पर एक संयुक्त बयान तैयार करना मुश्किल हो सकता है.

थरूर ने बताया कि हाल की विदेश मंत्रियों की बैठक में आम सहमति वाला संयुक्त घोषणा-पत्र जारी नहीं हो सका था. ऐसे में इस बार BRICS Summit में मतभेदों को दूर करके साझा फैसले तक पहुंचना भारत के राजनयिकों के लिए बड़ी चुनौती होगी.