'अगर गम में मिलता है पैरोल तो खुशी में क्यों नहीं?' बॉम्बे हाई कोर्ट ने रिहा किया अपराधी
Bombay High Court: बॉम्बे हाई कोर्ट ने एक अपराधी को इस लिए पैरोल दे दी, ताकि वो पढ़ाई के लिए विदेश जा रहे बेटे से मुलाकात कर पाए. कोर्ट ने कहा कि जब किसी गम या दुख की घड़ी में किसी को पैरोल दी जा सकती है, तो फिर खुशी के मौके पर ऐसा क्यों नहीं किया जा सकता है. जेल में उम्र कैद की सजा काट रहे अपराधी ने बेटे से मुलाकात के लिए पैरोल की मांग वाली याचिका दाखिल की थी.
Bombay High Court: बॉम्बे हाई कोर्ट ने इस सप्ताह की शुरुआत में कहा था कि अगर इमरजेंसी में दोषी को पैरोल दी जा सकती है, तो उसे परिवार के साथ खुशी के पल को शेयर करने के लिए छूट मिलनी चाहिए. कोर्ट की ये टिप्पणी उम्रकैद की सजा काट रहे एक दोषी की याचिका पर सुनवाई करते हुए की. उम्रकैद की सजा काट रहे अपराधी ने अपने बेटे से मिलने के लिए पैरोल मांगी थी, जो पढ़ाई के लिए विदेश जाने वाला था.
अपराधी के बेटे ने ऑस्ट्रेलिया की एक यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया है और वो 22 जुलाई को पढ़ाई के लिए वहां चला जाएगा. जस्टिस भारती डांगरे और जस्टिस मंजूषा देशपांडे की बेंच ने कहा कि पैरोल और फरलो को नियंत्रित करने वाले नियमों का उद्देश्य कैदी को अस्थायी रिहाई करना है, जो कि आवश्यक है. उन्होंने कहा कि ऐसा करना इसलिए भी जरूरी है, ताकि कैदी अपने पारिवारिक जीवन के साथ निरंतरता बनाए रख सके और पारिवारिक मामलों से निपट सके.
जस्टिस देशपांडे और जस्टिस डांगरे की पीठ ने कहा कि निरंतर जेल की लाइफ के बुरे प्रभावों से बचाने, जीवन में सक्रिय रुचि पैदा करने, अपराधी का मानसिक संतुलन बनाए रखने के लिए भी ये जरूरी है, ताकि अपराधी को भविष्य के लिए आशावान रहने में सक्षम बनाया जा सके.
व्यवस्था में विश्वास बहाल करना भी है उद्देश्य
जस्टिस ने कहा कि पैरोल और फरलो के प्रावधानों को बार-बार जेल में बंद दोषियों के प्रति मानवतावादी दृष्टिकोण के रूप में देखा गया है, क्योंकि वे उन्हीं के कृत्य के लिए जेल में बंद हैंय जेल (बॉम्बे फरलो और पैरोल) नियम, 1959 के तहत उपलब्ध कराए जा रहे लाभों का मूल उद्देश्य व्यवस्था में दोषी का विश्वास बहाल करना है.
पीठ ने नियमों का हवाला देते हुए कहा कि किसी कैदी को परिवार के किसी सदस्य की मृत्यु होने पर 7 दिन की आपातकालीन पैरोल, विवाह में शामिल होने के लिए 4 दिन की विशेष पैरोल, अपने परिवार के सदस्यों की जरूरतों को पूरा करने के लिए नियमित पैरोल दी जाती है, जिसमें गंभीर बीमारी, पत्नी का प्रसव या प्राकृतिक आपदाओं के मामले में परिवार की देखभाल आदि शामिल है.
अपराधी को पैरोल देते हुए पीठ ने और क्या कहा?
पीठ ने कहा कि हम ये समझने में असफल रहे हैं कि ऐसे सुखद अवसर पर, जहां दोषी बेटे ने ऑस्ट्रेलिया के यूनिवर्सिटी में एडमिशन लिया है और चूंकि वह इस आधार पर अस्थायी रिहाई की मांग कर रहा है, ताकि वह वित्तीय संसाधनों की व्यवस्था कर सके और अपने बेटे को विदाई भी दे सके, जो दो साल की अवधि के लिए देश से बाहर जाने वाला है, तो उसे पैरोल का लाभ देने से क्यों मना किया जाए.
सिलवासा जेल प्राधिकारियों ने याचिकाकर्ता को उसके बेटे को विदाई देने के लिए पैरोल देने से इस आधार पर इनकार कर दिया था कि मौजूदा नियमों में किसी अपराधी को अस्थायी छुट्टी पर रिहा करने का ऐसा कोई कारण नहीं बताया गया है.
9 सालों से जेल में बंद है अपराधी
याचिकाकर्ता यानी अपराधी लगभग 9 वर्षों से जेल में बंद है. उसने यह कहते हुए बॉम्बे हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया कि उसके बेटे को ऑस्ट्रेलिया के मेलबर्न में RMIT यूनिवर्सिटी में मास्टर ऑफ डेटा साइंस प्रोग्राम में एडमिशन लिए चुना गया है. सेमेस्टर 22 जुलाई, 2024 से शुरू होना है और इसकी अवधि 2 वर्ष है. याचिका में बताया गया है कि कोर्स के लिए छात्र की फीस करीब 36 लाख रुपये है.