जब 'दीपक' थी बीजेपी की विरासत, फिर कैसे खिला कमल? बेहद दिलचस्प है इसके पीछे की कहानी
आज बीजेपी की पहचान कमल चुनाव चिन्ह से है, लेकिन इसकी पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ 'दीपक' पर चुनाव लड़ती थी. जानिए 1980 में बीजेपी के गठन के बाद चुनाव आयोग ने पार्टी को कमल चुनाव चिन्ह कैसे आवंटित किया.
नई दिल्ली: आज भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) का चुनाव चिन्ह कमल देश के सबसे पहचान वाले राजनीतिक प्रतीकों में गिना जाता है. लेकिन बहुत कम लोग जानते हैं कि हमेशा से बीजेपी का चुनाव चिन्ह कमल नहीं था. बीजेपी की पूर्ववर्ती पार्टी भारतीय जनसंघ (Bharatiya Jana Sangh) का चुनाव चिन्ह दीपक था. 1980 में बीजेपी के गठन के बाद चुनाव आयोग की प्रक्रिया के तहत पार्टी को नया चुनाव चिन्ह मिला और तब से कमल उसकी पहचान बन गया.
आइए जानते हैं कि दीपक से कमल तक का यह सफर कैसे तय हुआ.
भारतीय जनसंघ और 'दीपक' चुनाव चिन्ह
भारतीय जनसंघ की स्थापना 21 अक्टूबर 1951 को डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने की थी. उस समय पार्टी को चुनाव आयोग ने 'दीपक' चुनाव चिन्ह आवंटित किया था. 1952, 1957, 1962, 1967 और 1971 के आम चुनावों में भारतीय जनसंघ ने इसी चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा. धीरे-धीरे दीपक जनसंघ की राजनीतिक पहचान बन गया.
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जनसंघ का जनता पार्टी में विलय
1975 में लगे आपातकाल के बाद विपक्षी दलों ने एकजुट होकर कांग्रेस का मुकाबला करने का फैसला किया. इसी क्रम में 1977 में भारतीय जनसंघ, भारतीय लोकदल, कांग्रेस (ओ), समाजवादी धड़े और कुछ अन्य दलों का विलय होकर जनता पार्टी बनी.
विलय के बाद भारतीय जनसंघ का अलग अस्तित्व समाप्त हो गया. इसके साथ ही उसका चुनाव चिन्ह 'दीपक' भी इस्तेमाल में नहीं रहा. जनता पार्टी ने चुनाव आयोग से मान्यता प्राप्त कर 'हलधर (कंधे पर हल लिए किसान)' चुनाव चिन्ह पर चुनाव लड़ा और 1977 का लोकसभा चुनाव जीतकर केंद्र में सरकार बनाई.
जनता पार्टी में विवाद और बीजेपी का जन्म
जनता पार्टी सरकार के दौरान राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) से जुड़े नेताओं की सदस्यता को लेकर विवाद बढ़ गया. यह विवाद इतना गहरा हो गया कि जनता पार्टी टूट गई.
इसके बाद 6 अप्रैल 1980 को अटल बिहारी वाजपेयी, लालकृष्ण आडवाणी, भैरों सिंह शेखावत, नानाजी देशमुख समेत जनसंघ परंपरा के नेताओं ने मिलकर भारतीय जनता पार्टी (BJP) की स्थापना की.
चूंकि यह एक नई राजनीतिक पार्टी थी, इसलिए इसे पुराने जनसंघ का चुनाव चिन्ह स्वतः नहीं मिल सकता था. चुनाव आयोग के नियमों के अनुसार नई पार्टी को अलग चुनाव चिन्ह आवंटित किया जाना था.
चुनाव आयोग ने कैसे दिया 'कमल' चुनाव चिन्ह?
1980 में बीजेपी के गठन के बाद पार्टी ने चुनाव आयोग के समक्ष पंजीकरण कराया. उस समय पार्टी को चुनाव लड़ने के लिए चुनाव चिन्ह की आवश्यकता थी.
चुनाव आयोग के पास उस समय उपलब्ध मुक्त (Free) चुनाव चिन्हों की सूची में 'कमल' भी शामिल था. आयोग ने नियमों के अनुसार बीजेपी को कमल चुनाव चिन्ह आवंटित कर दिया.
यह ध्यान देने वाली बात है कि कमल किसी विशेष राजनीतिक दल के लिए पहले से आरक्षित चुनाव चिन्ह नहीं था. आयोग ने उपलब्ध मुक्त प्रतीकों में से इसे बीजेपी को आवंटित किया. बाद में पार्टी को राष्ट्रीय पार्टी के रूप में मान्यता मिलने पर कमल उसका आरक्षित चुनाव चिन्ह (Reserved Symbol) बन गया.
कमल क्यों बना पार्टी की स्थायी पहचान?
कमल भारत का राष्ट्रीय पुष्प है और भारतीय संस्कृति में इसे पवित्रता, विकास और कठिन परिस्थितियों में भी खिलने के प्रतीक के रूप में देखा जाता है. हालांकि चुनाव आयोग चुनाव चिन्ह आवंटित करते समय राजनीतिक या सांस्कृतिक अर्थों के आधार पर नहीं, बल्कि चुनाव चिन्ह (आरक्षण एवं आवंटन) आदेश, 1968 के प्रावधानों के अनुसार निर्णय लेता है.
समय के साथ बीजेपी ने कमल को अपने राजनीतिक अभियान का प्रमुख प्रतीक बना लिया. पार्टी का नारा "कमल का फूल" देशभर में उसकी पहचान बन गया.
क्या बीजेपी 'दीपक' वापस ले सकती थी?
व्यवहारिक रूप से ऐसा संभव नहीं था. 1977 में भारतीय जनसंघ जनता पार्टी में विलय कर चुका था और उसका अलग संगठनात्मक अस्तित्व समाप्त हो गया था. 1980 में बनी बीजेपी एक नई पार्टी के रूप में पंजीकृत हुई. इसलिए उसे चुनाव आयोग की प्रक्रिया के तहत नया चुनाव चिन्ह लेना पड़ा.