नई दिल्ली: ट्रांसजेंडर्स की मेडिकल जांच का मकसद उनकी पहचान पर सवाल उठाना नहीं, बल्कि सुरक्षित और सही इलाज सुनिश्चित करना होता है. जेंडर डिस्फोरिया को समझने के लिए प्रक्रिया अक्सर मनोवैज्ञानिक मूल्यांकन से शुरू होती है, जिससे यह पता लगाया जाता है कि व्यक्ति लंबे समय से जेंडर असंगति महसूस कर रहा है या नहीं. साथ ही मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी दूसरी समस्याओं की जांच भी की जाती है और इलाज के लिए व्यक्ति की सहमति ली जाती है.
हार्मोन थेरेपी या सर्जरी शुरू करने से पहले डॉक्टर शारीरिक जांच और लैब टेस्ट के जरिए हार्मोन लेवल, हड्डियों की मजबूती, दिल से जुड़े जोखिम और प्रजनन क्षमता पर असर का आकलन करते हैं. यह मेडिकल निगरानी लंबे समय तक हार्मोन इस्तेमाल से होने वाली समस्याओं जैसे खून के थक्के, लिवर पर असर या ऑस्टियोपोरोसिस जैसे खतरे कम करने में मदद करती है.
कई देशों में कानूनी दस्तावेजों में जेंडर बदलने के लिए भी मेडिकल जांच जरूरी होती है. वहीं कुछ खेल संगठन निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा बनाए रखने के लिए भी ऐसे टेस्ट करवाते हैं. हालांकि आलोचकों का कहना है कि कुछ नियम जरूरत से ज्यादा सख्त हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि इन जांचों का उद्देश्य मरीज की सुरक्षा, सही निर्णय और लंबे समय के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देना होता है.
भारत में ट्रांसजेंडर अधिकारों को लेकर एक बार फिर बहस तेज हो गई है. संसद ने पिछले महीने ट्रांसजेंडर पर्सन्स यानी प्रोटेक्शन ऑफ राइट्स अमेंडमेंट बिल 2026 पास किया, जिसमें 2019 के कानून में बड़े बदलाव किए गए हैं. नए कानून के तहत किसी व्यक्ति की ट्रांसजेंडर पहचान की पुष्टि के लिए मेडिकल बोर्ड द्वारा जांच अनिवार्य कर दी गई है. इसी प्रावधान को लेकर विशेषज्ञों और अधिकार कार्यकर्ताओं ने गंभीर सवाल उठाए हैं.
आलोचकों का कहना है कि किसी व्यक्ति की जेंडर पहचान केवल शारीरिक जांच के आधार पर तय नहीं की जा सकती. मेडिकल विशेषज्ञों का मानना है कि जेंडर पहचान एक जटिल विषय है, जिसमें मानसिक, सामाजिक और व्यक्तिगत पहचान की भी बड़ी भूमिका होती है. केवल फिजिकल एग्जामिनेशन से यह तय करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं माना जा सकता.
विशेषज्ञों ने यह भी कहा है कि नया कानून कई ट्रांस पुरुषों, ट्रांस महिलाओं और नॉन बाइनरी लोगों को बाहर कर सकता है. कानून में ट्रांसजेंडर व्यक्ति की परिभाषा मुख्य रूप से हिजड़ा, किन्नर और अरावानी जैसी सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान तक सीमित बताई जा रही है. इससे उन लोगों को दिक्कत हो सकती है जो खुद को ट्रांसमैन, ट्रांसवुमन या नॉन बाइनरी के रूप में पहचानते हैं.
सरकार का कहना है कि इस बदलाव का मकसद पहचान प्रक्रिया को स्पष्ट बनाना और फर्जी दावों को रोकना है. हालांकि विरोध करने वाले लोग इसे व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सम्मान के खिलाफ मान रहे हैं.