सुरों की रानी से लेकर 'मास्टरशेफ' तक, सात समंदर पार कैसे पहुंचा आशा भोसले की 'मां की दाल' और बिरयानी का जादू?
महान पार्श्वगायिका आशा भोसले का 12 अप्रैल को निधन हो गया. सात दशकों तक अपनी जादुई आवाज से दुनिया को मंत्रमुग्ध करने वाली आशा ताई को संगीत के साथ-साथ खाना पकाने का भी गहरा जुनून था, जिसकी मिठास 'आशाज' रेस्तरां में आज भी जिंदा है.
नई दिल्ली: भारतीय संगीत जगत के एक स्वर्णिम युग का अंत हो गया है. 12 अप्रैल को महान पार्श्वगायिका आशा भोसले ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया. उनकी आवाज ने सात दशकों से अधिक समय तक न केवल भारतीयों बल्कि पूरी दुनिया को अपना दीवाना बनाए रखा. लेकिन आशा जी के व्यक्तित्व का एक और पहलू था जो उनके संगीत जितना ही समृद्ध था, उनका खाना बनाने के प्रति जुनून. उनके लिए रसोई सिर्फ एक कमरा नहीं, बल्कि एक मंच था जहां वे अपने जज्बातों और प्रेम का मिश्रण पकाती थीं.
आशा भोसले का पाक कला के प्रति प्रेम सिर्फ उनके परिवार तक सीमित नहीं था, बल्कि पूरी फिल्म इंडस्ट्री उनके हाथों के स्वाद की दीवानी थी. उन्होंने एक साक्षात्कार में भावुक होकर बताया था कि उनके घर हर हफ्ते 60-70 लोग सिर्फ खाना खाने जमा होते थे. वे रिकॉर्डिंग से थकी-हारी लौटने के बाद भी बड़े-बड़े पतीलों में खुद खाना तैयार करती थीं. उनके बेटे आनंद को उनकी बनाई बिरयानी और मटन-चिकन इतना पसंद था कि वह हमेशा इसकी फरमाइश किया करता था.
दिग्गजों से सीखे पाक कला के गुर
आशा जी ने संगीत की तरह ही खाना बनाने के हुनर भी बड़े-बड़े दिग्गजों से सीखे थे. उन्होंने मोमोज बनाना अभिनेत्री माला सिन्हा से सीखा, तो राज कपूर ने उन्हें पेशावरी बिरयानी के खास टिप्स दिए थे. दिल्ली के मशहूर बुखारा रेस्तरां के अफगान शेफ्स से उन्होंने दाल मखनी की बारीकियां सीखीं और मशहूर गीतकार मजरूह सुल्तानपुरी की बेगम से बिरयानी के हुनर हासिल किए. संगीत की बारीकियों की तरह ही वे मसालों के संतुलन को भी बखूबी समझती थीं.
पेशावरी दाल और लता दीदी की पसंद
अपनी मशहूर 'मां की दाल' के बारे में वे अक्सर गर्व से बताती थीं कि यह रेसिपी उन्होंने पेशावर के लोगों से सीखी थी और यह स्वाद कहीं और नहीं मिल सकता. संगीत की दुनिया की एक और महान हस्ती और उनकी बड़ी बहन लता मंगेशकर भी उनकी पाक कला की प्रशंसक थीं. लता जी को आशा जी के हाथों के बने शमी कबाब बेहद पसंद थे.
'आशाज' रेस्तरां: स्वाद की वैश्विक पहचान
साल 2002 में उन्होंने अपने इस जुनून को एक नई पहचान दी और दुबई में 'आशाज' (Asha's) नाम से अपना पहला रेस्तरां खोला. यह केवल एक रेस्तरां नहीं था, बल्कि उनके स्वाद की अमिट छाप थी जो बाद में मिडिल ईस्ट और यूनाइटेड किंगडम के बर्मिंघम और मैनचेस्टर जैसे शहरों तक फैल गई. आशा जी अक्सर कहती थीं कि वे शेफ कोट पहनकर उतनी ही खुश और गौरवान्वित महसूस करती हैं, जैसे कोई बहुत ही महंगा और खूबसूरत सूट पहन लिया हो.
संगीत और स्वाद की अमिट धरोहर
आशा भोंसले का जाना संगीत और कला जगत के लिए एक ऐसी क्षति है जिसकी भरपाई मुमकिन नहीं है. उन्होंने यह साबित कर दिया कि एक कलाकार की रचनात्मकता किसी एक क्षेत्र तक सीमित नहीं रहती. उनके लिए गाना और खाना बनाना दोनों ही दिल से किए जाने वाले कार्य थे. आज भले ही वे हमारे बीच नहीं हैं, लेकिन उनकी यह विरासत हमेशा उनके कालजयी गीतों और उनके बनाए पकवानों की खुशबू में दुनिया भर के प्रशंसकों के दिलों में जिंदा रहेगी.