Prem Chopra Birthday: हीरो बनने आए थे मुंबई, विलेन बनकर रचा इतिहास; कैसे सिर्फ एक डायलॉग से छा गए प्रेम चोपड़ा
बॉलीवुड के दिग्गज एक्टर प्रेम चोपड़ा 23 सितंबर को अपना 91वां जन्मदिन मना रहे हैं. हीरो बनने का सपना लेकर मुंबई पहुंचे प्रेम चोपड़ा ने शुरुआती दिनों में अखबार के सर्कुलेशन विभाग में नौकरी की थी.
हिंदी सिनेमा के इतिहास में जब भी सबसे यादगार खलनायकों की बात होती है, प्रेम चोपड़ा का नाम जरूर लिया जाता है. पर्दे पर उनकी मुस्कान, बोलने का अंदाज और खलनायक वाले किरदारों ने ऐसी पहचान बनाई कि कई दशक बाद भी दर्शक उन्हें उसी अंदाज में याद करते हैं.
प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा. यह छोटा सा डायलॉग उनके करियर की पहचान बन गया. लेकिन इस मुकाम तक पहुंचने का उनका सफर बिल्कुल आसान नहीं था. हीरो बनने की चाहत में मुंबई आने से लेकर अखबार में नौकरी करने और ट्रेन के सफर में पहला फिल्मी मौका मिलने तक उनकी जिंदगी में कई दिलचस्प मोड़ आए. 23 सितंबर 1935 को लाहौर में जन्मे प्रेम चोपड़ा 91 साल के हो गए हैं. उनके जन्मदिन पर जानते हैं उनकी जिंदगी और फिल्मी सफर से जुड़े कुछ दिलचस्प किस्से.
पिता चाहते थे बेटा बने डॉक्टर या IAS
प्रेम चोपड़ा का जन्म लाहौर में हुआ था, लेकिन उनका पालन-पोषण शिमला में हुआ. पढ़ाई पूरी करने के बाद उन्होंने पंजाब यूनिवर्सिटी से ग्रेजुएशन किया. उनके पिता चाहते थे कि प्रेम पढ़ाई पर ध्यान दें और आगे चलकर डॉक्टर या आईएएस अधिकारी बनें. प्रेम चोपड़ा के सपने हालांकि कुछ और थे. उन्हें फिल्मों में काम करना था और इसी सपने को पूरा करने के लिए उन्होंने मुंबई का रुख किया. मुंबई पहुंचना आसान था, लेकिन वहां टिके रहना मुश्किल. फिल्मों में तुरंत काम नहीं मिला और रोजमर्रा के खर्च के लिए उन्हें नौकरी करनी पड़ी.
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अखबार के सर्कुलेशन विभाग में की नौकरी
संघर्ष के दिनों में प्रेम चोपड़ा ने एक अखबार के सर्कुलेशन डिपार्टमेंट में काम करना शुरू किया. उनकी जिम्मेदारी बंगाल, ओडिशा और बिहार जैसे इलाकों में अखबार के वितरण से जुड़े काम को संभालने की थी. नौकरी के कारण उन्हें महीने में करीब 20 दिन यात्रा करनी पड़ती थी. लेकिन उनका असली सपना फिल्मों में जाने का था.
इसलिए प्रेम चोपड़ा ने अपने काम को जल्दी पूरा करने का तरीका निकाला. वह अलग-अलग शहरों में एजेंटों को रेलवे स्टेशन पर बुला लेते थे और वहीं काम निपटा देते थे. इससे करीब 20 दिन का दौरा 12 दिनों में पूरा हो जाता था. बचे हुए दिनों में वह मुंबई लौटकर एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के चक्कर लगाते और फिल्म में काम पाने की कोशिश करते थे.
ट्रेन में मिला पहला फिल्मी ऑफर
प्रेम चोपड़ा की जिंदगी का बड़ा मोड़ भी एक सफर के दौरान आया. एक दिन वह ट्रेन में यात्रा कर रहे थे, तभी एक पंजाबी फिल्म निर्माता की नजर उन पर पड़ी. उनकी मुलाकात बातचीत में बदली और प्रेम चोपड़ा को फिल्म चौधरी करनैल सिंह में काम करने का मौका मिल गया. यही उनके फिल्मी सफर की शुरुआत बनी. फिल्म की कहानी एक मुस्लिम लड़के और हिंदू लड़की की प्रेम कहानी पर आधारित थी. फिल्म को बाद में नेशनल अवॉर्ड भी मिला. बताया जाता है कि प्रेम चोपड़ा को इस फिल्म के लिए करीब 2500 रुपये मिले थे.
एक लाइन ने बना दिया बॉलीवुड का आइकॉनिक विलेन
साल 1973 में राज कपूर फिल्म बॉबी बना रहे थे. तब तक प्रेम चोपड़ा फिल्म इंडस्ट्री में अपनी पहचान स्थापित कर चुके थे. प्रेम चोपड़ा के मुताबिक, एक पार्टी के दौरान राज कपूर ने उनसे कहा था कि वह उनकी फिल्म में काम कर रहे हैं. यह सुनकर प्रेम काफी खुश हुए. लेकिन जब उन्होंने अपने किरदार के बारे में पूछा तो राज कपूर ने उस समय ज्यादा जानकारी नहीं दी. बाद में शूटिंग के दौरान उन्हें पता चला कि फिल्म में उनका रोल बेहद छोटा है. एक सीन में उन्हें सिर्फ अपना परिचय देना था. यही वह सीन था जिसमें उन्होंने कहा था, प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा.
फिल्म रिलीज हुई और यह एक लाइन दर्शकों की जुबान पर चढ़ गई. समय के साथ यह हिंदी सिनेमा के सबसे चर्चित डायलॉग्स में शामिल हो गई और प्रेम चोपड़ा की पहचान का हिस्सा बन गई. इस संवाद का असर इतना बड़ा रहा कि बाद में उनकी आत्मकथा का नाम भी प्रेम नाम है मेरा, प्रेम चोपड़ा रखा गया.