अमेरिका की 'आंधी' से भारत में बढ़ेगी EMI की टेंशन? 19 साल के हाई पर Bond Yield, जानें आपकी जेब पर क्या होगा असर?

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड के 19 साल के ऊंचे स्तर पर पहुंचने से भारत पर भी दबाव बढ़ सकता है. विदेशी निवेश, रुपया, शेयर बाजार और कर्ज की लागत प्रभावित होने से EMI सस्ती होने में देरी संभव है.

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Kuldeep Sharma

नई दिल्ली: अमेरिका में सरकारी कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर के पार पहुंचने और बॉन्ड यील्ड में तेज उछाल ने वैश्विक बाजारों की चिंता बढ़ा दी है. इसका असर भारत तक भी पहुंच सकता है. विदेशी निवेशकों के रुख से लेकर रुपये की चाल और ब्याज दरों तक, अमेरिकी बॉन्ड बाजार की हलचल भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए महत्वपूर्ण बन गई है.

अमेरिका में बॉन्ड यील्ड क्यों बढ़ी?

अमेरिकी सरकारी बॉन्ड की यील्ड में तेजी के पीछे कई वजहें हैं. अमेरिका का सरकारी कर्ज 40 ट्रिलियन डॉलर से ऊपर निकल गया है, जिसके कारण सरकार को लगातार नए बॉन्ड जारी करने पड़ रहे हैं. सप्लाई बढ़ने और मांग पर दबाव आने से यील्ड ऊपर जाती है. 

इसके साथ महंगाई को लेकर चिंता और पश्चिम एशिया में तनाव के कारण कच्चे तेल की कीमतों को लेकर अनिश्चितता भी निवेशकों की चिंता बढ़ा रही है. लंबी अवधि के बॉन्ड खरीदने वाले निवेशक अब ज्यादा रिटर्न चाहते हैं. अमेरिकी ट्रेजरी की ओर से बॉन्ड बायबैक के जरिए दबाव कम करने की कोशिश हुई, लेकिन यील्ड में फिर तेजी देखने को मिली.


भारत के शेयर बाजार और रुपये पर असर

अमेरिकी बॉन्ड पर ज्यादा रिटर्न मिलने से विदेशी निवेशकों के लिए भारत जैसे उभरते बाजारों में निवेश का आकर्षण घट सकता है. ऐसे में विदेशी संस्थागत निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी संपत्तियों में लगा सकते हैं. इससे घरेलू बाजार में बिकवाली का दबाव बढ़ सकता है. दूसरी तरफ विदेशी निवेश की निकासी के दौरान डॉलर की मांग बढ़ने से रुपये पर दबाव पड़ सकता है. कमजोर रुपया भारत के लिए कच्चे तेल और दूसरे आयात को महंगा करता है. इसका असर महंगाई पर पड़ सकता है और अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बढ़ सकती है.

EMI सस्ती होने की उम्मीद पर क्यों लगा ब्रेक?

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड बढ़ने का असर वैश्विक ब्याज दरों के माहौल पर पड़ सकता है. भारत में भी बॉन्ड यील्ड पर दबाव बढ़ा तो बैंकों के लिए फंड जुटाना महंगा हो सकता है. साथ ही कमजोर रुपये और महंगे आयात से महंगाई बढ़ने की आशंका रहती है. ऐसी स्थिति में रिजर्व बैंक के लिए रेपो रेट में जल्द कटौती करना आसान नहीं होगा. अगर रेपो रेट में कमी नहीं आती, तो होम लोन और कार लोन की ब्याज दरों में राहत मिलने में समय लग सकता है. यानी EMI कम होने का इंतजार कर रहे लोगों के लिए अमेरिकी बॉन्ड बाजार की यह हलचल अहम है.