सोलर से लेकर सेमीकंडक्टर तक! चांदी की डिमांड ने बढ़ाई की अहमियत; भविष्य की सबसे कीमती मेटल बनेगी चांदी?
औद्योगिक क्षेत्र यानी सोलर पैनल, ईवी और सेमीकंडक्टर में बढ़ती मांग और खदानों की सीमित सप्लाई के कारण चांदी का संकट बढ़ रहा है. आयात घटाने की भारत की नीति के बीच निवेश के लिए एमसीएक्स ने 100 ग्राम का नया कॉन्ट्रैक्ट शुरू किया है.
मुंबई: चांदी अब सिर्फ गहनों, सिक्कों या निवेश तक सीमित रहने वाली कीमती धातु नहीं रह गई है. आज यह दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण औद्योगिक धातुओं में से एक बन चुकी है. सोलर एनर्जी, इलेक्ट्रिक व्हीकल, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स और एडवांस मैन्युफैक्चरिंग में बढ़ते इस्तेमाल ने चांदी को वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए एक रणनीतिक संसाधन बना दिया है.
मांग और सप्लाई में बड़ा अंतर
पिछले कुछ सालों में चांदी की मांग बहुत तेजी से बढ़ी है, जिसका सबसे बड़ा कारण रिन्यूएबल एनर्जी सेक्टर की ग्रोथ है. अपनी बेहतरीन इलेक्ट्रीकल कंडक्टिविटी के कारण सोलर पैनलों में चांदी का भारी इस्तेमाल होता है. दूसरी तरफ, बाजार में चांदी की सप्लाई उस रफ्तार से नहीं बढ़ पा रही है. नई खदानें तेजी से तैयार नहीं हो रही हैं और पुरानी खदानों की क्षमता सीमित है. नतीजा यह है कि वैश्विक बाजार में कई सालों से चांदी की किल्लत चल रही है. दुनिया में चांदी का उत्पादन कम और खपत ज्यादा हो रही है जिससे लंबी अवधि में इसकी कीमतें बढ़ने के आसार हैं.
भारत की रणनीति और चुनौतियां
भारत दुनिया में चांदी के सबसे बड़े खरीदारों और आयातकों में से एक है. लेकिन देश में इसका उत्पादन बहुत कम होने के कारण हमें विदेशों पर निर्भर रहना पड़ता है. इस निर्भरता को कम करने के लिए भारत सरकार ने कई कदम उठाए हैं. चांदी पर इम्पोर्ट ड्यूटी बढ़ाकर 15% कर दी गई है. हाई-प्योरिटी चांदी की सिल्लियों के आयात को 'फ्री' से हटाकर 'प्रतिबंधित' केटेगरी में डाल दिया गया है. सरकार का मानना है कि इन कड़े कदमों से विदेशी मुद्रा भंडार बचेगा, जरूरत से ज्यादा आयात रुकेगा और देश में पुरानी चांदी को रीसायकल करने के उद्योग को बढ़ावा मिलेगा.
क्या मुश्किलें हो सकती हैं?
भारत का लक्ष्य 2030 तक सोलर पावर के दम पर रिन्यूएबल एनर्जी क्षमता को बड़े पैमाने पर बढ़ाना है. लेकिन चांदी महंगी होने से सोलर कंपनियों की लागत बढ़ेगी, जिससे ये प्रोजेक्ट्स महंगे हो सकते हैं. इसके अलावा, सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स, टेलिकॉम और ईवी जैसे हाई-टेक उद्योगों को भी महंगी चांदी के कारण वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा करने में दिक्कत आ सकती है.
भारत बनाम चीन
चांदी को लेकर भारत और चीन की रणनीति में बड़ा अंतर है. जहां चीन सोलर पैनल बनाने में दुनिया का लीडर है. वह अपनी औद्योगिक जरूरतों को पूरा करने के लिए चांदी का आयात लगातार बढ़ा रहा है ताकि उसकी सप्लाई चेन मजबूत रहे. तो वहीं भारत का पूरा जोर आत्मनिर्भर बनने और आयात बिल को घटाने पर है.
चीन जहां सप्लाई चेन पर कब्जा जमाने और संसाधनों को सुरक्षित करने पर ध्यान दे रहा है तो वहीं भारत विदेशी निर्भरता कम करने में जुटा है. आने वाले समय में भारत के लिए इन दोनों के बीच सही संतुलन बनाना बेहद जरूरी होगा.
छोटे निवेशकों के लिए बड़ा मौका
अब निवेशकों को चांदी को सिर्फ एक सोने जैसी धातु के रूप में नहीं बल्कि औद्योगिक विकास से जुड़े विकल्प के तौर पर देखना चाहिए. आम और छोटे निवेशकों को आकर्षित करने के लिए मल्टी कमोडिटी एक्सचेंज ने जून 2026 में 'सिल्वर 100 फ्यूचर्स' नाम का एक नया कॉन्ट्रैक्ट शुरू किया है. यह कॉन्ट्रैक्ट सिर्फ 100 ग्राम चांदी का है जिससे यह काफी किफायती और सुलभ हो गया है. कम पैसों से शुरुआत होने के कारण अब छोटे निवेशक भी आसानी से चांदी के बाजार में पैसा लगा सकेंगे.