Rbi Mis-Selling Rules: बैंकों की मनमानी पर चला RBI का डंडा, जबरन फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स बेचना पड़ेगा महंगा
आरबीआई ने बैंकों द्वारा अनचाहे फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स बेचने यानी मिस-सेलिंग और ऐप्स पर डिजिटल चालाकियों को पूरी तरह बैन कर दिया है. 1 जनवरी 2027 से लागू होने वाले इन नियमों से ग्राहकों की सुरक्षा मजबूत होगी.
नई दिल्ली: भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों द्वारा ग्राहकों को गुमराह करके या उन पर दबाव डालकर अनचाहे फाइनेंशियल प्रोडक्ट्स जैसे बीमा या इन्वेस्टमेंट प्लान बेचने के ट्रेडिशन यानी 'मिस-सेलिंग' पर पूरी तरह लगाम लगा दी है. आरबीआई ने 15 जून 2026 को 'रिस्पॉन्सिबल बिजनेस कंडक्ट अमेंडमेंट डायरेक्शंस' जारी कर नए और कड़े नियम लागू किए हैं.
ये नए नियम 1 जनवरी 2027 से देश के सभी कमर्शियल बैंकों पर लागू हो जाएंगे. स्मॉल फाइनेंस बैंक, पेमेंट्स बैंक और क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक फिलहाल अलग गाइडलाइंस का पालन करते रहेंगे. सभी बैंकों को इन नियमों को पूरी तरह अपनाने के लिए 2026 के अंत तक का समय दिया गया है.
आखिर क्या है 'मिस-सेलिंग'?
आरबीआई ने बैंकिंग सेक्टर में पहली बार 'मिस-सेलिंग' को साफ शब्दों में परिभाषित किया है. नए नियमों के अनुसार इन परिस्थितियों को मिस-सेलिंग माना जाएगा-
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1. ग्राहक की वित्तीय स्थिति यानी फाइनेंशियल प्रोफाइल के हिसाब से गलत प्रोडक्ट बेचना, भले ही ग्राहक ने उस पर दस्तखत कर दिए हों.
2. गलत, भ्रामक या अधूरी जानकारी देकर प्रोडक्ट बेचना.
3. ग्राहक की स्पष्ट और लिखित मंजूरी के बिना कोई सर्विस चालू करना.
4. एक प्रोडक्ट देने के बदले दूसरे प्रोडक्ट को खरीदने की शर्त रखना.
5. सेबी (SEBI), आईआरडीएआई (IRDAI) या पीएफआरडीए (PFRDA) जैसे अन्य रेगुलेटर्स द्वारा गलत ठहराए गए तौर-तरीके अपनाना.
6. मुआवजे का नियम- यदि मिस-सेलिंग साबित होती है तो बैंक को ग्राहक की पूरी रकम रिफंड करनी होगी और नुकसान की भरपाई भी करनी होगी. ग्राहक एग्रीमेंट मिलने के 30 दिनों के भीतर शिकायत दर्ज करा सकते हैं.
लोन के साथ बीमा की जबरन लिंकिंग पर रोक
अक्सर लोन लेते समय बैंक ग्राहकों पर अपनी पसंदीदा कंपनी की इंश्योरेंस पॉलिसी लेने का दबाव बनाते हैं. आरबीआई ने अब इस 'जबरन बंडलिंग' को पूरी तरह बैन कर दिया है. अब बैंक किसी भी लोन या क्रेडिट प्रोडक्ट को देने के लिए बीमा खरीदने की शर्त नहीं रख सकते. यदि लोन की सुरक्षा के लिए बीमा वाकई जरूरी है तो भी ग्राहक अपनी मर्जी से किसी भी कंपनी से बीमा खरीदने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र होगा. बैंक उस पर दबाव नहीं बना सकता. हालांकि ग्राहक अपनी मर्जी से कॉम्बो प्रोडक्ट चुन सकते हैं.
ग्राहकों की मंजूरी के नियम हुए सख्त
अब बैंक लोन एप्लीकेशन फॉर्म के बारीक अक्षरों या पहले से टिक किए गए चेकबॉक्स के जरिए ग्राहकों की मंजूरी नहीं हथिया सकेंगे.
1. हर एक प्रोडक्ट के लिए अलग से और स्पष्ट मंजूरी लेनी होगी.
2. डिजिटल ऐप्स की स्क्रीन पर डिफ़ॉल्ट रूप से हमेशा 'No' या 'I Do Not Agree' का विकल्प सेट रहेगा. ग्राहक को खुद आगे बढ़कर 'Yes' चुनना होगा.
3. बैंक को ग्राहक के साथ रिश्ता खत्म होने के कम से कम एक साल बाद तक इन मंजूरी रिकॉर्ड्स को संभालकर रखना होगा.
4. मंजूरी लेने से पहले बैंक को ब्याज दरें, फीस, रिस्क, लॉक-इन पीरियड और पेनल्टी जैसी जरूरी बातें साफ-साफ समझानी होंगी.
एजेंट्स (DSAs और DMAs) पर कड़ा पहरा
बाजार में बैंकों के लिए काम करने वाले डायरेक्ट सेलिंग एजेंट्स (DSAs) और मार्केटिंग एजेंट्स पर भी नकेल कसी गई है.
1. बैंकों को अपनी वेबसाइट पर अधिकृत एजेंट्स की पूरी लिस्ट डालनी होगी और हर 7 दिन में इसे अपडेट करना होगा.
2. बैंक ब्रांच के भीतर काम करने वाले एजेंट्स की पहचान अलग होनी चाहिए ताकि ग्राहक उन्हें बैंक कर्मचारी न समझें.
3. एजेंट्स केवल 'सुबह 9 बजे से शाम 7 बजे के बीच' ही ग्राहकों को कॉल कर सकते हैं. बिना इजाजत घर या दफ्तर जाना सख्त मना है.
प्रोडक्ट बेचने से पहले जांचनी होगी उपयोगिता
कोई भी जटिल यानी कॉम्पलैक्स निवेश या बीमा प्रोडक्ट बेचने से पहले बैंकों को ग्राहक की उम्र, कमाई, वित्तीय समझ और रिस्क लेने की क्षमता का आकलन करना होगा. भौतिक फॉर्म के मामले में हर प्रोडक्ट का अलग आवेदन पत्र होगा. इसके अलावा, बिक्री पूरी होने के 30 दिनों के भीतर एक स्वतंत्र टीम द्वारा ग्राहक का फीडबैक लिया जाएगा.
बैंकों के इन 11 डिजिटल हथकंडों पर लगी रोक
आरबीआई ने मोबाइल ऐप्स और वेबसाइट्स पर इस्तेमाल होने वाली 11 ऑनलाइन चालाकियों को पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया है.
1. फर्जी जल्दबाजी- टाइमर चलाकर या 'ऑफर खत्म होने वाला है' कहकर दबाव बनाना.
2. चुपके से सामान जोड़ना- लोन प्रोसेस के दौरान बिना बताए इंश्योरेंस जोड़ देना.
3. शर्मिंदा करना- ऑफर रिजेक्ट करने पर 'नहीं, मुझे एक्स्ट्रा सुरक्षा नहीं चाहिए' जैसे शब्दों का इस्तेमाल करना.
4. जबरन एक्शन- स्क्रीन क्लोज करने पर भी बार-बार विज्ञापन या पॉप-अप दिखाना.
5. सब्सक्रिप्शन का जाल- सर्विस चालू करना आसान और बंद करना बेहद मुश्किल बनाना.
6. इंटरफेस में हेरफेर- पसंदीदा ऑप्शन को चमकाना और काम के अन्य विकल्पों को छिपा देना.
7. झांसा देना- विज्ञापन में कम ब्याज दर दिखाना और असल में ज्यादा वसूलना.
8. छिपी हुई कीमतें - फाइनल पेमेंट के वक्त अचानक एक्स्ट्रा फीस या चार्जेस दिखाना.
9. भ्रामक विज्ञापन- विज्ञापन को 'अर्जेंट अकाउंट अलर्ट' की तरह भेजना.
10. बार-बार टोकना- ग्राहक के मना करने के बावजूद बार-बार कुकीज या डेटा शेयरिंग का पॉप-अप देना.
11. घुमावदार भाषा- उलझाने वाले शब्दों का इस्तेमाल करना ताकि ग्राहक अनजाने में हां कह दे.
सरकार और रेगुलेटर्स की चिंताएं
यह सख्त कदम वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और आईआरडीएआई (IRDAI) के अध्यक्ष देवाशीष पांडा द्वारा समय-समय पर जताई गई चिंताओं के बाद उठाया गया है. वित्त मंत्री ने पहले ही सचेत किया था कि मिस-सेलिंग से ग्राहकों पर अतिरिक्त बोझ पड़ता है और अब इसे भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत एक अपराध की तरह देखा जाता है. वरिष्ठ नागरिकों को गलत निवेश प्लान बेचना और लोन के लिए बीमा अनिवार्य बताना इसके मुख्य उदाहरण रहे हैं.
1 जनवरी 2027 से ग्राहकों को क्या मिलेगा?
1. बैंक अपनी पसंद की बीमा कंपनी से पॉलिसी लेने के लिए मजबूर नहीं कर पाएंगे.
2. बिना अनुमति शाम 7 बजे के बाद आने वाले कॉल्स या विजिट्स सीधे तौर पर आरबीआई के नियमों का उल्लंघन माने जाएंगे.
3. हर सर्विस और प्रोडक्ट के लिए आपकी अलग और साफ मंजूरी ली जाएगी.