मध्य पूर्व में तेज होते सैन्य तनाव का असर अब भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर साफ दिखाई देने लगा है. कतर में तरलीकृत प्राकृतिक गैस यानी LNG उत्पादन रुकने के बाद भारतीय कंपनियों ने उद्योगों को दी जाने वाली गैस आपूर्ति घटानी शुरू कर दी है. आशंका है कि यदि हालात जल्द सामान्य नहीं हुए तो देश में गैस की उपलब्धता और कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है. सरकार और सार्वजनिक क्षेत्र की ऊर्जा कंपनियां वैकल्पिक इंतजामों की दिशा में सक्रिय हो गई हैं.
ईरान द्वारा ड्रोन हमले के बाद कतर ने अपने LNG निर्यात संयंत्र का संचालन अस्थायी रूप से रोक दिया है. यह संयंत्र दुनिया के सबसे बड़े LNG निर्यात केंद्रों में गिना जाता है. कतर दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा LNG निर्यातक है और भारत के कुल LNG आयात का लगभग आधा हिस्सा वहीं से आता है. ऐसे में आपूर्ति रुकने से वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धा तेज होने और कीमतों में उछाल की आशंका बढ़ गई है.
स्थिति की गंभीरता को देखते हुए पेट्रोलियम मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने सरकारी तेल और गैस कंपनियों के प्रमुखों के साथ बैठक की. मंत्रालय ने भरोसा दिलाया है कि देश में प्रमुख पेट्रोलियम उत्पादों की उपलब्धता और किफायती दाम सुनिश्चित करने के लिए कदम उठाए जाएंगे. संकेत हैं कि जरूरत पड़ने पर घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी जाएगी और उद्योगों को गैस आपूर्ति सीमित की जा सकती है.
पेट्रोनेट LNG लिमिटेड और गेल (इंडिया) लिमिटेड, जिनके पास कतर से दीर्घकालिक समझौते हैं, अतिरिक्त कार्गो के लिए स्पॉट टेंडर जारी करने पर विचार कर रही हैं. सूत्रों के मुताबिक सरकार सरकार-से-सरकार समझौते के जरिए भी गैस खरीदने के विकल्प तलाश रही है. विशेषज्ञों का मानना है कि यदि कतर और अबू धाबी में उत्पादन लंबे समय तक बाधित रहा तो एशियाई बाजारों में आपूर्ति दबाव और बढ़ेगा.
तनाव के बीच LNG टैंकरों की चार्टर दरें दोगुने से अधिक हो गई हैं. अटलांटिक क्षेत्र में एक LNG पोत के लिए प्रतिदिन 2 लाख डॉलर से अधिक की मांग की जा रही है, जो पहले के मुकाबले करीब तीन गुना है. हालांकि कुछ विश्लेषकों का कहना है कि वास्तविक सौदे तभी तेज बढ़ेंगे जब उत्पादन बाधा लंबी चलेगी. फिलहाल भारतीय कंपनियों ने एहतियातन औद्योगिक गैस आपूर्ति में कटौती शुरू कर दी है.