पूर्व SEBI चीफ माधबी पुरी बुच को लोकपाल ने दी क्लीन चिट, अडाणी समूह को हिलाने वाली हिंडनबर्ग ने लगाए थे आरोप

लोकपाल ने स्पष्ट किया कि इन आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं है, ये निराधार, अप्रमाणित और तुच्छ प्रतीत होते हैं.

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Gyanendra Tiwari

लोकपाल ने बुधवार को पूर्व भारतीय प्रतिभूति और विनिमय बोर्ड (SEBI) प्रमुख माधबी पुरी बुच को हिंडनबर्ग रिपोर्ट के आधार पर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों से पूरी तरह मुक्त कर दिया. लोकपाल ने स्पष्ट किया कि इन आरोपों में कोई ठोस आधार नहीं है, ये निराधार, अप्रमाणित और तुच्छ प्रतीत होते हैं.

अमेरिकी शॉर्ट-सेलर हिंडनबर्ग रिसर्च और कांग्रेस पार्टी ने माधबी पुरी बुच पर हितों के टकराव और वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोप लगाए थे. अगस्त 2024 में हिंडनबर्ग ने दावा किया था कि बुच और उनके पति का कुछ गुप्त विदेशी कंपनियों में हिस्सा था, जो कथित तौर पर अदाणी समूह से जुड़े ‘मनी सिफनिंग स्कैंडल’ में शामिल थीं.

REIT और ब्लैकस्टोन से जुड़ा मामला

कांग्रेस ने आरोप लगाया था कि SEBI प्रमुख रहते हुए बुच ने रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REIT) को बढ़ावा दिया, जिससे ब्लैकस्टोन को लाभ हुआ. यह आरोप इसलिए महत्वपूर्ण था क्योंकि ब्लैकस्टोन से बुच के पति का संबंध बताया गया. विपक्ष ने आरोप लगाया कि उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग किया.

ICICI बैंक से आय छिपाने का आरोप

एक अन्य आरोप यह था कि बुच ने अपने पूर्व नियोक्ता ICICI बैंक से प्राप्त आय को ठीक से घोषित नहीं किया. हालांकि, जांच में यह स्पष्ट हुआ कि उन्होंने अक्टूबर 2013 में सेवानिवृत्ति के बाद कोई वेतन या स्टॉक विकल्प नहीं लिया, केवल सामान्य सेवानिवृत्ति लाभ प्राप्त किए जो नियमों के अनुसार थे. सरकार ने इस बात की पुष्टि की कि कोई अवैध लेन-देन नहीं हुआ.

सेबी कर्मचारियों की शिकायतें

तीसरा मुद्दा कार्यसंस्कृति से जुड़ा था. कुछ सेबी कर्मचारियों ने वित्त मंत्रालय को पत्र लिखकर शिकायत की थी कि बुच के नेतृत्व में कार्यस्थल का वातावरण तनावपूर्ण है. आरोप लगाए गए कि अधिकारी कर्मचारियों से अभद्र भाषा में बात करते हैं. हालांकि, जांच में पाया गया कि यह असंतोष, बुच द्वारा सेबी में किए जा रहे सुधारों के कारण हो सकता है. सरकार ने सेबी प्रबंधन को स्टाफ के प्रति संवेदनशील होने की सलाह दी और मामला शांत हो गया.

लोकपाल का निष्कर्ष: कोई आपराधिक आधार नहीं

लोकपाल ने सभी आरोपों और प्रस्तुत सबूतों का परीक्षण करने के बाद निष्कर्ष निकाला कि इनमें कोई कानूनी दम नहीं है. न तो कोई आपराधिक कृत्य सिद्ध होता है, न ही किसी तरह की जांच का आधार बनता है.