केंद्र सरकार ने भारत से जमीन सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश को लेकर नियमों में अहम बदलाव किए हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई केंद्रीय कैबिनेट बैठक में विदेशी प्रत्यक्ष निवेश यानी FDI नीति में संशोधन को मंजूरी दी गई. सरकार का कहना है कि इन बदलावों का उद्देश्य निवेश प्रक्रिया को सरल बनाना और स्टार्टअप तथा उद्योगों में विदेशी पूंजी के प्रवाह को बढ़ाना है. साथ ही निवेश प्रस्तावों पर निर्णय लेने के लिए तय समय सीमा भी निर्धारित की गई है.
नई व्यवस्था के तहत पड़ोसी देशों के ऐसे निवेशकों को बड़ी राहत दी गई है जिनकी किसी भारतीय कंपनी में गैर-नियंत्रण हिस्सेदारी 10 प्रतिशत तक है. अब इस तरह के निवेश को ऑटोमैटिक रूट के तहत अनुमति दी जाएगी. पहले ऐसे मामलों में भी सरकार की मंजूरी लेना अनिवार्य था, जिसे अब हटा दिया गया है.
साल 2020 में कोविड महामारी के दौरान सरकार ने FDI नीति को कड़ा कर दिया था. उस समय आशंका जताई गई थी कि आर्थिक दबाव के कारण विदेशी कंपनियां भारतीय कंपनियों में हिस्सेदारी खरीद सकती हैं. इसलिए सीमा साझा करने वाले देशों से आने वाले निवेश को केवल सरकारी मंजूरी के जरिए ही अनुमति दी जाती थी.
सरकार ने निवेश प्रस्तावों के निपटारे के लिए समय सीमा भी तय की है. पूंजीगत सामान, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, इलेक्ट्रॉनिक कंपोनेंट, पॉलीसिलिकॉन और इंगोट-वेफर जैसे क्षेत्रों में आने वाले निवेश प्रस्तावों पर अधिकतम 60 दिनों के भीतर फैसला लिया जाएगा. इससे निवेश प्रक्रिया में पारदर्शिता और तेजी आने की उम्मीद है.
नई नीति के तहत यह भी स्पष्ट किया गया है कि जिन कंपनियों में ऐसा निवेश होगा, उनमें बहुमत हिस्सेदारी और नियंत्रण भारतीय नागरिकों या भारतीय स्वामित्व वाली संस्थाओं के पास ही रहेगा. इससे राष्ट्रीय हितों की सुरक्षा के साथ विदेशी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलेगा.
सरकार का मानना है कि इन बदलावों से भारत में निवेश का माहौल बेहतर होगा. इससे नई तकनीक तक पहुंच बढ़ेगी, घरेलू कंपनियों को विस्तार का मौका मिलेगा और भारत वैश्विक सप्लाई चेन में अपनी भूमिका मजबूत कर सकेगा. साथ ही यह कदम आत्मनिर्भर भारत अभियान और आर्थिक विकास को भी गति देगा.