लाखों रुपये की सैलरी और हाथ में चमचमाता हुआ आईफोन देखकर लगता है कि बंदे की लाइफ सेट है. लेकिन हकीकत यह है कि आज के दौर में मोटी कमाई करने वाले भी महीने के अंत में पाई-पाई के लिए परेशान दिखते हैं. सोशल मीडिया और पर्सनल फाइनेंस फोरम ऐसे हाई-सैलरी प्रोफेशनल्स की कहानियों से भरे पड़े हैं जो हर महीने 1,2 या 3 लाख रुपये कमाने के बावजूद फाइनेंशियल स्ट्रेस झेल रहे हैं. ऐसे में यह सवाल उठना लाजिमी है कि क्या लोग जरूरत से ज्यादा खर्च कर रहे हैं या वाकई जिंदगी बहुत महंगी हो गई है? इसका जवाब इन दोनों के बीच छिपा है.
कुछ साल पहले तक हर महीने 1 लाख रुपये कमाना एक रूतबा माना जाता था लेकिन आज के बड़े शहरों में यह एक औसत इनकम बनकर रह गई है. मकान का किराया, बच्चों की पढ़ाई, हेल्थकेयर, इंश्योरेंस का प्रीमियम और बाहर खाना-पीना सब कुछ बहुत महंगा हो चुका है.
लेकिन कहानी सिर्फ महंगाई की नहीं है. असली विलेन है 'लाइफस्टाइल इन्फ्लेशन'. जैसे-जैसे लोगों की कमाई बढ़ती है उनके खर्च उससे भी ज्यादा तेजी से बढ़ने लगते हैं. लोग बड़े घरों में शिफ्ट हो जाते हैं, महंगी गाड़ियां और गैजेट्स खरीदने लगते हैं और जो चीजें कभी लग्जरी थीं वे जरूरत बन जाती हैं. ऊपर से सोशल मीडिया का 'दिखावा' इस आग में घी का काम करता है जहां दूसरों की देखा-देखी लोग अपनी लाइफस्टाइल को अपग्रेड करने के कम्पटीशन में कूद पड़ते हैं.
नतीजतन कमाई का एक बहुत बड़ा हिस्सा होम लोन, कार लोन और क्रेडिट कार्ड की ईएमआई चुकाने में ही निकल जाता है. फाइनेंशियल एक्सपर्ट्स का मानना है कि 'इनकम' और 'वेल्थ' में बहुत बड़ा फर्क होता है. हर महीने 3 लाख कमाने वाला इंसान भी अगर कुछ नहीं बचाता तो वह उस व्यक्ति से ज्यादा कमजोर है जो 80 हजार रुपये कमाकर भी लगातार सही जगह निवेश कर रहा है.
एक्सपर्ट्स इस दलदल से बचने के लिए '3-6-9 नियम' के तहत इमरजेंसी फंड बनाने की सलाह देते हैं. अकेले रहने वालों को कम से कम 3 महीने का, परिवार वालों को 6 महीने का और फ्रीलांसर या बिजनेसमैन को 9 से 12 महीने का खर्च बचाकर रखना चाहिए. अंत में बात घूम-फिर कर वहीं आती है कि आपकी फाइनेंशियल सिक्योरिटी इस बात पर तय नहीं होती कि आप कितना कमाते हैं बल्कि इस पर तय होती है कि आप कितना बचाते और निवेश करते हैं.