भीषण गर्मी के प्रकोप से भारत के लोग परेशान चल रहे हैं. यह मौसम की मार सिर्फ एक देश नहीं बल्कि पूरे दुनिया भर के शहरों में एक साइलेंट किलर बनकर उभर रही हैं. विश्व बैंक की एक ताजा रिपोर्ट ने आने वाले सालों को लेकर लागोें के मन में चिंता और डर पैदा कर दिया है.
इस रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2050 तक भीषण गर्मी की चपेट में आने वाले शहरी गरीबों की संख्या में 700 फीसदी का भारी उछाल देखने को मिलेगा. विश्व बैंक का मानना है कि अगर दुनिया की सरकारों ने तुरंत कोई ठोस कदम नहीं उठाया, तो आने वाले दश्कों में शहर कंक्रीट की सुलगते भट्ठों में तब्दील हो जाएंगे. अगर हमने अपने शहरी ढांचे को तुरंत नहीं बदला, तो 2050 तक शहरों में सांस लेना भी एक संघर्ष बन जाएगा
रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल साउथ के शहरों में हालात सबसे ज्यादा भयनाक हैं. अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव के कारण कंक्रीट से पटे शहरों का तापमान अपने आसपास के ग्रामीण इलाकों की तुलना में 10 डिग्री सेल्सियस तक ज्यादा दर्ज किया जा रहा है. इस जानलेवा गर्मी के कारण दिहाड़ी मजदूरों की आजीविका छिन रही है, स्कूलों में बच्चों की उपस्थिति गिर रही है और पावर ग्रिड्स पर बिजली की मांग का दबाव जानलेवा स्तर तक बढ़ गया है.
रिपोर्ट में साफ चेतावनी दी गई है कि पश्चिमी अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया के शहरों पर इसका सबसे बुरा असर पड़ेगा. खुली धूप में काम करने वाले दिहाड़ी मजदूर, बुजुर्ग, बच्चे और गरीब परिवार इस हीटवेव के सबसे पहले और आसान शिकार बनेंगे. गर्मी अब केवल असुविधा नहीं बल्कि मौत, बेरोजगारी और भुखमरी का एक सीधा कारण बनती जा रही है.
इस विकराल संकट से निपटने के लिए विश्व बैंक ने UN-Habitat और UNEP के साथ मिलकर हैंडबुक ऑन अर्बन हीट मैनेजमेंट इन द ग्लोबल साउथ जारी की है. यह हैंडबुक सरकारों और शहरी योजनाकारों के लिए एक मास्टरप्लान है. इसमें पैसिव कूलिंग तकनीक, बिल्डिंग्स पर ग्रीन रूफ, इको-फ्रेंडली वास्तुकला और शहरों में हरियाली बढ़ाने जैसे जरूरी उपाय सुझाए गए हैं.