रुपये की गिरावट चिंता की बात नहीं, निर्यातकों को हो सकता है फायदा: एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री
एशियन डेवलपमेंट बैंक के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क ने कहा है कि 2026 में अब तक डॉलर के मुकाबले रुपये में करीब 6 फीसदी की गिरावट को लेकर ज्यादा चिंतित होने की जरूरत नहीं है.
डॉलर के मुकाबले रुपये में लगातार आ रही कमजोरी के बीच एशियन डेवलपमेंट बैंक यानी एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क ने इसे लेकर बड़ी बात कही है. उनका कहना है कि रुपये में मौजूदा गिरावट को फिलहाल गंभीर चिंता के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए. उन्होंने कहा कि एशिया के कई देशों की मुद्राओं में भी इस तरह की कमजोरी देखने को मिली है और इसके पीछे वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों के साथ तेल की बढ़ी हुई कीमतें अहम वजह हैं.
27 अगस्त को रुपया डॉलर के मुकाबले मामूली मजबूती के साथ 95.44 पर खुला. इससे पहले मंगलवार को रुपया 95.41 के स्तर पर बंद हुआ था. हालांकि, साल की शुरुआत से अब तक भारतीय मुद्रा में डॉलर के मुकाबले करीब 6 फीसदी की गिरावट दर्ज की जा चुकी है.
अल्बर्ट पार्क ने क्या कहा?
अल्बर्ट पार्क के मुताबिक, इस गिरावट को केवल भारत तक सीमित घटनाक्रम के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए. क्षेत्र के कई देशों की मुद्राओं पर दबाव बना हुआ है. संकट या अनिश्चितता के दौर में निवेशक आमतौर पर डॉलर आधारित संपत्तियों को सुरक्षित मानते हुए उनकी ओर रुख करते हैं, जिससे दूसरी मुद्राओं पर दबाव बढ़ता है.
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पार्क ने रुपये की कमजोरी के पीछे कच्चे तेल की ऊंची कीमतों को भी अहम कारण बताया. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है. ऐसे में तेल महंगा होने पर देश को ज्यादा विदेशी मुद्रा खर्च करनी पड़ती है. उन्होंने कहा कि ऊर्जा और फर्टिलाइजर जैसे उत्पादों के आयात पर अधिक खर्च होने से चालू खाता घाटा बढ़ सकता है. यही स्थिति रुपये पर अतिरिक्त दबाव डालती है. उनके अनुसार, वैश्विक अनिश्चितता और तेल की महंगाई, ये दोनों प्रमुख कारण भारतीय मुद्रा में गिरावट के पीछे काम कर रहे हैं.
निर्यातकों को मिल सकता है फायदा
एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री ने कहा कि 2026 में अब तक रुपये में 6 से 7 फीसदी की गिरावट को लेकर बहुत ज्यादा परेशान होने की जरूरत नहीं है. कमजोर रुपया अर्थव्यवस्था के हर क्षेत्र के लिए नुकसानदायक नहीं होता. उन्होंने कहा कि इसका फायदा निर्यातकों को मिल सकता है. जब रुपया कमजोर होता है तो विदेशों में भारतीय वस्तुएं और सेवाएं तुलनात्मक रूप से अधिक प्रतिस्पर्धी हो सकती हैं. इससे निर्यात करने वाली कंपनियों को कुछ राहत मिलने की संभावना रहती है.