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पावर स्टीयरिंग होने के बावजूद कार मोड़ना क्यों पड़ता है भारी? जानें कारण और आसान समाधान

आजकल ज्यादातर कारों में पावर स्टीयरिंग होती है, फिर भी कई बार स्टीयरिंग भारी हो जाती है. हाइड्रोलिक सिस्टम में पावर स्टीयरिंग फ्लूइड कम होने, लीकेज या एयर घुसने से यह समस्या आती है.

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Reepu Kumari

नई दिल्ली: हर रोज सड़क पर गाड़ी चलाने वाले ड्राइवरों को कभी-कभी स्टीयरिंग घुमाने में काफी मेहनत करनी पड़ती है, भले ही कार में पावर स्टीयरिंग लगी हो. यह समस्या आम है और ज्यादातर हाइड्रोलिक पावर स्टीयरिंग वाली पुरानी या मध्यम कारों में देखने को मिलती है. अगर समय रहते ध्यान न दिया जाए तो छोटी समस्या बड़ी खराबी में बदल सकती है. आइए जानते हैं कि ऐसा क्यों होता है और इसे कैसे ठीक किया जा सकता है. 

पावर स्टीयरिंग भारी होने के मुख्य कारण

अगर स्टीयरिंग घुमाने में ज्यादा जोर लगाना पड़ रहा है तो सबसे पहले पावर स्टीयरिंग फ्लूइड चेक करें. फ्लूइड कम होने से सिस्टम में दबाव नहीं बन पाता. साथ ही लीकेज की वजह से तेल कम होता रहता है. कई बार पुराना तेल गाढ़ा हो जाता है या सिस्टम में हवा घुस जाती है, जिससे अजीब-सी आवाज भी आने लगती है. 

फ्लूइड कैसे चेक करें और ठीक करें

कार को सपाट जगह पर पार्क करके इंजन बंद करें. पावर स्टीयरिंग की टंकी खोलकर लेवल चेक करें. अगर लेवल मिनिमम से नीचे है तो कंपनी द्वारा सुझाए गए सही ग्रेड का तेल डालें. टंकी को ओवरफिल न करें. तेल डालने के बाद कार चलाकर टेस्ट करें. अगर समस्या बनी रहे तो तुरंत मैकेनिक के पास ले जाएं. 

हाइड्रोलिक पावर स्टीयरिंग सिस्टम कैसे काम करता है

हाइड्रोलिक सिस्टम में इंजन से जुड़ा पंप तेल पर दबाव बनाता है. यह दबाव पाइपों के जरिए स्टीयरिंग रैक तक पहुंचता है और पहियों को घुमाना आसान बना देता है. तेल पूरे सिस्टम में लगातार घूमता रहता है. इसलिए नियमित रूप से तेल का स्तर और क्वालिटी चेक करना बहुत जरूरी है. 

इलेक्ट्रिक पावर स्टीयरिंग के फायदे

नई कारों में अब इलेक्ट्रिक पावर स्टीयरिंग (EPS) का चलन बढ़ गया है. यह इंजन पर बोझ नहीं डालती, जिससे माइलेज बेहतर रहता है. इसमें तेल की जरूरत नहीं पड़ती और लेन असिस्ट, ऑटो पार्किंग जैसे स्मार्ट फीचर्स आसानी से जोड़े जा सकते हैं. रखरखाव भी कम लगता है.

पावर स्टीयरिंग का रोचक इतिहास

पावर स्टीयरिंग की शुरुआत 1926 में फ्रांसिस डब्ल्यू. डेविस ने की थी. पहले इसका इस्तेमाल दूसरे विश्व युद्ध के भारी वाहनों में हुआ. 1951 में क्रिसलर इंपीरियल पहली व्यावसायिक कार बनी जिसमें यह फीचर था. आज यह हर कार में आम हो गया है और ड्राइविंग को सुरक्षित व आरामदायक बनाता है.