क्यों 'हैप्पी गुड फ्राइडे' कहना माना जाता है गलत? जानें इसका इतिहास और दर्द भरी वजह

गुड फ्राइडे ईसा मसीह के बलिदान को याद करने का दिन है. यह खुशी का नहीं बल्कि शोक और श्रद्धा का दिन होता है. इस दिन प्रार्थना, उपवास और सादगी के साथ लोग उनके त्याग को याद करते हैं.

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Km Jaya

नई दिल्ली: गुड फ्राइडे 2026 इस साल 3 अप्रैल को मनाया जा रहा है और यह ईसाई धर्म का बेहद महत्वपूर्ण दिन माना जाता है. इस दिन Jesus Christ के बलिदान को याद किया जाता है, जब उन्हें सूली पर चढ़ाया गया था. यह दिन Easter से ठीक पहले आता है और गहरे शोक और श्रद्धा के साथ मनाया जाता है.

गुड फ्राइडे को कुछ जगहों पर ब्लैक फ्राइडे, होली फ्राइडे या ग्रेट फ्राइडे भी कहा जाता है. इस दिन दुनिया भर के ईसाई लोग चर्च जाकर प्रार्थना करते हैं और ईसा मसीह के कष्टों को याद करते हैं. यह दिन खुशी का नहीं बल्कि आत्मचिंतन और शांति का दिन होता है.

कैसे मनाते हैं गुड फ्राइडे?

गुड फ्राइडे के दिन लोग सादगी से जीवन बिताते हैं. कई लोग उपवास रखते हैं और मांसाहारी भोजन से दूरी बनाते हैं. चर्च में विशेष प्रार्थना सभाएं होती हैं, जहां लोग क्रॉस के सामने सिर झुकाकर प्रार्थना करते हैं. कई जगहों पर जुलूस और झांकियां भी निकाली जाती हैं, जिनमें ईसा मसीह के अंतिम समय की घटनाओं को दिखाया जाता है.

क्या होता है इसका मतलब?

इस दिन को ‘गुड’ फ्राइडे कहा जाता है, लेकिन इसका मतलब खुशी नहीं होता है. ‘गुड’ शब्द को यहां पवित्रता और ईश्वर से जोड़कर देखा जाता है. इसलिए इस दिन किसी को ‘हैप्पी गुड फ्राइडे’ कहना सही नहीं माना जाता है. यह दिन शोक और सम्मान व्यक्त करने का होता है, न कि खुशियां मनाने का.

क्या है इसका इतिहास?

गुड फ्राइडे का इतिहास बेहद दर्दनाक घटना से जुड़ा है. मान्यता के अनुसार जब ईसा मसीह के उपदेश तेजी से फैलने लगे, तो कुछ धर्मगुरुओं ने रोमन शासक पिलातुस से उनकी शिकायत की. उन पर धर्म का अपमान और राजद्रोह जैसे आरोप लगाए गए.

इसके बाद पिलातुस ने उन्हें मृत्यु दंड देने का आदेश दिया. सजा से पहले उन्हें कई यातनाएं दी गईं. उन्हें कोड़े मारे गए और कांटों का ताज पहनाया गया. अंत में उन्हें कीलों से ठोककर सूली पर चढ़ा दिया गया. जिस स्थान पर यह घटना हुई, उसे गोलगोथा कहा जाता है.

शुक्रवार के दिन क्यों मनाई जाती है?

यह घटना शुक्रवार के दिन हुई थी, इसलिए इसे गुड फ्राइडे कहा जाता है. ईसाई धर्म में यह दिन प्रेम, त्याग और बलिदान का प्रतीक माना जाता है. इस दिन दोपहर 12 से 3 बजे तक विशेष प्रार्थना की जाती है, क्योंकि इसी समय ईसा मसीह को सूली पर चढ़ाया गया था.