आज भी माता सीता के दिए हुए श्राप को भोग रहे हैं ये लोग!

Ramayan Facts: पौराणिक कथाओं के अनुसार प्रभु श्रीराम और माता सीता विनम्रता की मूर्ति हैं. क्रोध, भगवान श्रीराम और माता सीता से दूर ही रहता था, लेकिन एक बार माता सीता ने भयंकर क्रोध में कुछ प्राणियों को श्राप दे दिया था. उस से आज तक भी ये लोग उस श्राप को भोग रहे हैं. 

Mohit Tiwari

Ramayan Facts:  ममता और वात्सल्य की मूर्ति मां सीता के क्रोध के बारे में आपने बहुत कम ही सुना होगा. मां का वात्सल्य स्वरूप के बारे में ही हर कोई जानता है. प्रभु श्रीराम और माता सीता से क्रोध स्वयं ही दूर रहता था, लेकिन क्या आप जानते हैं कि एक समय ऐसा भी आया था, जब माता सीता ने क्रोध में पृथ्वी के कुछ प्राणियों को श्राप दे दिया था. ये प्राणी आज तक इस श्राप को भोग रहे हैं. माता सीता और प्रभु श्रीराम सरल और शांत स्वभाव के थे. एक बार जब कुछ प्राणियों ने माता सीता और प्रभु श्रीराम के समक्ष झूठ बोला तो उन्हें लक्ष्मी स्वरूपा मां सीता के क्रोध का भागी होना पड़ा था. 

किसको दिया था माता सीता ने श्राप

वाल्मीकि रामायण में राजा दशरथ के श्राद्ध के समय का एक किस्सा वर्णित है. इस कथा के अनुसार वनवास के दौरान भगवान श्रीराम और माता सीता व भइया लक्ष्मण पितृपक्ष के समय श्राद्ध करने लिए गया धाम गए थे. श्राद्ध की विधि में प्रयोग होने वाली सामग्रियों को लेने के लिए प्रभु श्रीराम और भइया लक्ष्मण नगर की ओर गए. प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण को गए हुए दोपहर होने को आई थी, लेकिन दोनों में से कोई भी सामग्री को लेकर श्राद्ध स्थल पर नहीं पहुंचा था. इसको देखते हुए माता सीता ने गया जी के आगे फाल्गू नदी के तट पर राजा दशरथ का पिंडदान किया तथा श्राद्ध कर्म की विधि को पूर्ण किया था. 

इस विधि को करते समय माता सीता ने वहां पर मौजूद वटवृक्ष, केतकी के फूल और गाय को अपना साक्षी बनाया था. इसके साथ ही इस समय कौवा, पंडित भी वहीं पर उपस्थित थे. इसके बाद जब प्रभु श्रीराम लौटकर वापस आए तो उन्होंने माता सीता ने उनको पूरा वृत्तांत बताया और कहा कि उन्होंने श्राद्ध कर्म को पूरा कर लिया है. इस पर जब प्रभु श्रीराम ने श्राद्ध कर्म पूर्ण करने का साक्ष्य उनसे मांगा तो माता सीता ने साक्ष्य के तौर पर केतकी के फूल, वटवृक्ष, गाय और फाल्गू नदी, कौवा और पंडित से पिंडदान का प्रमाण देने को कहा, तो पंडित, कौवे, गाय और केतकी के फूल ने श्रीराम के समक्ष झूठ बोल दिया. सिर्फ वटवृक्ष ने ही सत्य कहा और राजा दशरथ के पिंडदान की बात को स्वीकारा. इसके बाद माता सीता ने अपने ससुर राजा दशरथ का ही स्मरण करके उनसे ही सत्य साक्ष्य देने को कहा. इस पर राजा दशरथ प्रकट हुए और उन्होंने सीता माता के पक्ष में पूरी बात प्रभु श्रीराम को बता दी. 

झूठ बोलने पर दिया श्राप

इस पर माता सीता ने पंडित, कौवा, गाय और केतकी के फूल व फाल्गू नदी को श्राप दिया. फाल्गू नदी को बिना पानी के रहने, गाय को जूठन खाने, केतकी के फूल का प्रयोग पूजा में वर्जित करने व पंडित को दरिद्र रहने का श्राप दिया था. इसके साथ ही कौवे तो श्राप मिला कि उसका अकेले खाने से कभी भी पेट नहीं भरेगा और उसकी अकस्मिक मृत्यु होगी. 

आज भी भोग रहे हैं फल

माता सीता के श्राप के कारण आज भी फाल्गू नदी में पानी नहीं है. इसके साथ ही गाय को जूठन खानी पड़ती है. केतकी के फूलों का भी पूजा में कभी उपयोग नहीं किया जाता है. वहीं, वटवृक्ष ने सच बोला था तो माता सीता ने उनको सुहाग का प्रतीक माने जाने का वरदान दिया था. इस कारण आज भी सुहागिन स्त्रियां वटवृक्ष की पूजा कर पति की लंबी उम्र की कामना करती हैं. 

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