Matri Navami Shraddh 2026: पितृपक्ष की इस खास तिथि पर क्यों होता है सिर्फ सुहागिन माताओं का श्राद्ध? जानें रहस्य

पितृपक्ष की नवमी तिथि को मातृ नवमी के नाम से जाना जाता है, जो विशेष रूप से सुहागिन अवस्था में दिवंगत हुई स्त्रियों के श्राद्ध के लिए सबसे उत्तम मानी गई है.

Pinterest
Reepu Kumari

Matri Navami Shraddh 2026: हिंदू धर्म में पितृपक्ष के दौरान पूर्वजों के प्रति श्रद्धा और कृतज्ञता प्रकट करने की पुरानी परंपरा चली आ रही है. हर पितर का श्राद्ध उनकी मृत्यु तिथि के अनुसार ही किया जाता है, यानी जिस दिन किसी पूर्वज ने इस संसार को छोड़ा था, पितृपक्ष में उसी तिथि पर उनका श्राद्ध संपन्न किया जाता है. इसी क्रम में आश्विन मास के कृष्णपक्ष की नवमी तिथि का भी एक खास स्थान है.

श्राद्धपक्ष की इस नवमी तिथि को मातृ नवमी कहा जाता है, और यह तिथि विशेष रूप से माता और परिवार की विवाहित महिलाओं के श्राद्ध के लिए सबसे श्रेष्ठ मानी गई है. धर्माचार्यों के अनुसार यह दिन मातृशक्ति के प्रति सम्मान प्रकट करने के लिए समर्पित है, इसलिए इसका महत्व और भी बढ़ जाता है.

सुहागिन स्त्री के श्राद्ध की खास परंपरा

धर्मशास्त्रों में इस तिथि को विशेष रूप से मृत सधवा स्त्री के लिए नियत किया गया है. मान्यता है कि यदि किसी महिला का निधन पति के जीवित रहते होता है, तो मृत्यु के बाद भी उसकी गिनती सधवा स्त्रियों में ही होती है. आगे चलकर जब उसके पति का भी देहांत हो जाता है, तब भी वह सधवा ही मानी जाती है. ऐसे में श्राद्धकर्ता यानी पति के निधन के बाद यह श्राद्ध करने की जिम्मेदारी उसके पुत्र की होती है.


किन परिस्थितियों में बदल जाते हैं नियम

शास्त्रों में कुछ खास स्थितियों का भी उल्लेख मिलता है. अगर श्राद्धकर्ता पुत्र का स्वयं देहांत हो जाए, तो उसके बच्चों यानी पोते-पोतियों को पितामही का अविधवा नवमी श्राद्ध नहीं करना चाहिए. वहीं अगर सौतेली मां जीवित हों और सगी मां का निधन हो चुका हो, तब भी पुत्र को यह श्राद्ध करना अनिवार्य बताया गया है. यह नियम परिवार की संरचना के अनुसार बदलते रहते हैं.

एक से अधिक माताओं के श्राद्ध का विधान

यदि किसी परिवार में एक से ज्यादा माताओं का निधन सधवा अवस्था में हुआ हो, तो उन सभी का श्राद्ध अविधवा नवमी के दिन एकतंत्रीय पद्धति से किया जाना चाहिए. ऐसी स्थिति में भोजन के लिए उतनी ही संख्या में सुहागिन महिलाओं को आमंत्रित करने की परंपरा है. यह भी स्पष्ट किया गया है कि पुत्र न होने की स्थिति में पुत्री या दामाद यह श्राद्ध नहीं कर सकते, यह अधिकार केवल पुत्र को ही प्राप्त है.

Disclaimer: यहां दी गई सभी जानकारी सामान्य मान्यताओं और जानकारियों पर आधारित है.  theindiadaily.com  इन जानकारियों की पुष्टि नहीं करता है. किसी भी जानकारी को अमल में लाने से पहले संबंधित विशेषज्ञ से सलाह ले लें.