Maa Kalaratri Worship: नवरात्रि में हर दिन मां दुर्गा के एक स्वरूप की पूजा की जाती है. सातवें दिन मां कालरात्रि की आराधना होती है, जिन्हें शक्ति, साहस और भय से मुक्ति का प्रतीक माना जाता है. इस दिन दिन में होने वाली सामान्य पूजा के अलावा रात के समय निशा पूजा का भी विशेष महत्व बताया गया है. धार्मिक मान्यताओं में इसे देवी की उपासना और विशेष साधना का समय माना जाता है.
महासप्तमी की आधी रात को होने वाली इस पूजा को लेकर लोगों के मन में कई सवाल उठते हैं. आखिर निशा पूजा रात में ही क्यों की जाती है और इसमें बलि देने की परंपरा का क्या अर्थ है? धार्मिक परंपराओं में बलि का स्वरूप हर जगह एक जैसा नहीं है. कई जगह पेठा, नारियल या दूसरी वस्तुओं को प्रतीकात्मक रूप से अर्पित किया जाता है. इसका उद्देश्य नकारात्मकता और बुराइयों का त्याग माना जाता है.
मां दुर्गा के सातवें स्वरूप कालरात्रि के नाम में ‘काल’ का संबंध समय और मृत्यु से, जबकि ‘रात्रि’ का अर्थ अंधकार से जोड़ा जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, मां का यह स्वरूप भय, अज्ञान और नकारात्मक शक्तियों के विनाश का प्रतीक है. उन्हें गर्दभ यानी गधे पर सवार, बिखरे केशों और बाहर निकली जिह्वा के साथ दर्शाया जाता है. उग्र स्वरूप होने के बावजूद उन्हें भक्तों का कल्याण करने वाली ‘शुभंकारी’ कहा जाता है.
निशा पूजा का संबंध रात के विशेष समय यानी निशीथ काल से माना जाता है. कुछ तांत्रिक परंपराओं में इस दौरान विशेष मंत्रों और विधियों के साथ देवी की आराधना की जाती है. मान्यता है कि यह साधना मानसिक स्थिरता, साहस और भय से मुक्ति की भावना को मजबूत करती है. हालांकि, पूजा का समय और विधि परंपरा तथा स्थानीय मान्यताओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है.
निशा पूजा से जुड़ी कुछ परंपराओं में बलि का उल्लेख मिलता है. कई स्थानों पर पशुबलि के बजाय पेठा, नारियल या अन्य वस्तुओं की प्रतीकात्मक बलि दी जाती है. इसे बुराइयों, नकारात्मक विचारों और अहंकार का त्याग करने के संकेत के रूप में समझा जाता है. मां कालरात्रि को रात में खिलने वाले फूल, गुड़ और गुड़ से बनी चीजें अर्पित करने की भी परंपरा है. पूजा में शृंगार सामग्री चढ़ाई जाती है.
देश के कई शक्तिपीठों और देवी मंदिरों में निशा पूजा की परंपरा प्रचलित है. इनमें असम का कामाख्या मंदिर, पश्चिम बंगाल का तारापीठ, बिहार का थावे भवानी मंदिर और मां मंगलागौरी मंदिर, जयपुर के आमेर महल में स्थित शिला माता मंदिर तथा त्रिपुरा का मां त्रिपुरेश्वरी मंदिर शामिल हैं.
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