छोटे बच्चों को क्यों नहीं जलाते? गरुड़ पुराण में छिपा है अंतिम संस्कार का रहस्य; जानें धार्मिक कारण

गरुड़ पुराण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दो वर्ष तक की उम्र के बच्चों और नवजात शिशुओं की मृत्यु होने पर कई परंपराओं में दाह संस्कार के बजाय दफनाने का विधान बताया गया है.

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Km Jaya

नई दिल्ली: हिंदू धर्म में किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद आमतौर पर दाह संस्कार की परंपरा रही है. हालांकि, नवजात शिशुओं और बहुत छोटे बच्चों की मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार की प्रक्रिया अलग मानी जाती है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, दो वर्ष तक की उम्र के बच्चों के शव को जलाने के बजाय जमीन में दफनाने का विधान बताया गया है. इसका उल्लेख गरुड़ पुराण से जुड़ी मान्यताओं में मिलता है.

गरुड़ पुराण में भगवान विष्णु और पक्षीराज गरुड़ के संवाद के माध्यम से मृत्यु, आत्मा, कर्म और अंतिम संस्कार से जुड़े कई विषयों का वर्णन किया गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, यदि गर्भपात हो जाए या जन्म के बाद दो वर्ष की आयु तक बच्चे की मृत्यु हो जाए तो उसके शरीर को दफनाने का विधान बताया गया है. वहीं, दो वर्ष से अधिक उम्र के बच्चों के लिए दाह संस्कार की परंपरा का उल्लेख मिलता है.

अंतिम संस्कार को लेकर नियम

छोटे बच्चों के अंतिम संस्कार को लेकर अलग नियम बताए जाने के पीछे धार्मिक मान्यता यह है कि जन्म के शुरुआती वर्षों में बच्चे सांसारिक मोह और कर्मों की समझ से दूर होते हैं. जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, व्यक्ति का शरीर, परिवार और संसार से लगाव बढ़ता जाता है. इसी आधार पर माना जाता है कि कम उम्र में मृत्यु होने पर बच्चे की आत्मा का शरीर और संसार से वैसा मोह नहीं होता, जैसा किसी वयस्क व्यक्ति का माना जाता है.


गरुड़ पुराण से जुड़ी धार्मिक मान्यता

गरुड़ पुराण से जुड़ी धार्मिक मान्यताओं में यह भी कहा गया है कि दो वर्ष से कम उम्र में मृत्यु होने वाले बच्चे को सामान्य व्यक्ति की तरह यमलोक के कष्टों से नहीं गुजरना पड़ता. ऐसी मान्यता है कि बच्चे की आत्मा को सीधे स्वर्ग की प्राप्ति होती है और उसकी कम उम्र को विशेष महत्व दिया जाता है.

दान-पुण्य का महत्व

मृत शिशु की आत्मा की शांति के लिए दान-पुण्य को भी महत्वपूर्ण माना गया है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, बच्चे की उम्र के अनुसार दूध का दान करने की परंपरा बताई गई है. एक मान्यता के मुताबिक, शिशु जितने महीने का था, उतने बच्चों को दूध पिलाने से उसकी आत्मा को शांति मिलती है. हालांकि, अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में इन परंपराओं का पालन अलग तरीके से किया जाता है.

छोटे बच्चों के श्राद्ध को लेकर भी हिंदू परंपराओं में अलग नियम बताए गए हैं. धार्मिक मान्यता के अनुसार, श्राद्ध से जुड़ी कुछ विशेष क्रियाएं उन लोगों के लिए मानी जाती हैं जिनके कुछ संस्कार संपन्न हो चुके हों. इसी वजह से बहुत कम उम्र में मृत्यु होने वाले बच्चों के लिए वयस्कों की तरह सामान्य श्राद्ध कर्म करने की परंपरा कई स्थानों पर नहीं है.

दसवें अध्याय से जुड़ी मान्यता

गरुड़ पुराण के दसवें अध्याय से जुड़ी मान्यताओं में अलग-अलग उम्र के बच्चों की मृत्यु पर अलग धार्मिक क्रियाओं और दान का उल्लेख मिलता है. कुछ अवस्थाओं में दूध का दान, जल से भरे घड़े का दान, खीर का भोजन और अन्य धार्मिक कार्य करने की बातें कही गई हैं. पांच वर्ष या उससे अधिक उम्र के बच्चों के लिए पायस यानी खीर और गुड़ से बने पिंडों के दान का उल्लेख भी मिलता है.

बच्चों की मासूमियत को हिंदू धार्मिक परंपरा में विशेष महत्व दिया गया है. कुछ लोककथाओं में बच्चों की निष्कपटता और भगवान की करुणा से जुड़ी कथाएं भी मिलती हैं. ऐसी कथाओं का उद्देश्य बच्चों को निर्दोष और पवित्र मानने की धार्मिक भावना को दर्शाना है.

यह ध्यान रखना जरूरी है कि गरुड़ पुराण से जुड़े अंतिम संस्कार के नियम धार्मिक मान्यताओं और परंपराओं का हिस्सा हैं. अलग-अलग संप्रदायों, क्षेत्रों और परिवारों में अंतिम संस्कार की विधियां अलग हो सकती हैं. इसलिए ऐसी परिस्थिति में परिवार की परंपरा और संबंधित धर्माचार्य की सलाह को महत्व देना उचित माना जाता है.