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हरियाली और हरतालिका... नाम में है तीज, लेकिन व्रत और मान्यता में जमीन-आसमान का फर्क, जानिए दोनों की कहानी

हरियाली तीज और हरतालिका तीज दोनों ही शिव-पार्वती की आराधना और महिलाओं की आस्था से जुड़े पर्व हैं, लेकिन दोनों की तिथि, परंपरा और व्रत की विधि अलग है.

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Reepu Kumari

Hartalika Teej: भारतीय परंपरा में तीज सिर्फ एक त्योहार नहीं, बल्कि महिलाओं की आस्था, प्रेम और पारिवारिक सुख से जुड़ा पर्व है. हरियाली तीज और हरतालिका तीज दोनों में भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है, इसलिए अक्सर लोग इन्हें एक ही मान लेते हैं. लेकिन दोनों पर्वों की तिथि, मान्यता और व्रत की परंपरा अलग है. हरतालिका तीज इस साल 14 सितंबर 2026 को मनाई जाएगी. इस दिन सुहागिन महिलाएं पति की लंबी उम्र और परिवार की खुशहाली की कामना करती हैं.

दोनों तीजों का संबंध महिलाओं की धार्मिक आस्था और वैवाहिक जीवन की मंगलकामना से है, लेकिन इनके रंग और स्वरूप में बड़ा अंतर दिखाई देता है. हरियाली तीज में जहां हरे कपड़े, मेहंदी, झूले और लोकगीतों का उल्लास देखने को मिलता है, वहीं हरतालिका तीज में पूजा-पाठ और कठिन उपवास पर अधिक जोर रहता है. अविवाहित लड़कियां भी हरतालिका तीज का व्रत मनचाहा वर पाने की इच्छा से रखती हैं. इसी वजह से दोनों पर्व जुड़े होने के बावजूद अलग पहचान रखते हैं.

तिथि बदलते ही बदल जाता है पर्व

हरियाली तीज श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाई जाती है. यह खास तौर पर उत्तर भारत में लोकप्रिय है और राजस्थान, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश तथा हरियाणा में उत्साह से मनाई जाती है. दूसरी ओर हरतालिका तीज भाद्रपद शुक्ल पक्ष की तृतीया को आती है. हरियाली तीज को कई जगह ‘श्रृंगार तीज’ भी कहा जाता है, जबकि हरतालिका तीज की पहचान कठोर व्रत और शिव-पार्वती पूजा से होती है.


हरियाली तीज में उत्सव का रंग ज्यादा

हरियाली तीज को सौभाग्य, प्रेम और हरियाली से जोड़कर देखा जाता है. इस दिन महिलाएं हरे वस्त्र पहनती हैं, मेहंदी लगाती हैं और झूला झूलते हुए पारंपरिक गीत गाती हैं. सखियों और परिवार के साथ मिलकर त्योहार मनाने की परंपरा भी है. नई-नवेली दुल्हनों के लिए यह पर्व खास माना जाता है, क्योंकि इस मौके पर उनके मायके जाने और परिवार के साथ समय बिताने की परंपरा भी देखने को मिलती है.

हरतालिका तीज की कथा में छिपा तप

हरतालिका तीज की मान्यता माता पार्वती की कठोर साधना से जुड़ी है. कथा के अनुसार, शिवजी को पति रूप में पाने की इच्छा से पार्वती ने जंगल में जाकर कठिन तप किया और निर्जल व्रत रखा. उनकी साधना से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें पत्नी के रूप में स्वीकार किया. इसी विश्वास के साथ महिलाएं हरतालिका तीज पर शिव-पार्वती की पूजा करती हैं और कई जगह रातभर जागकर व्रत कथा का श्रवण करती हैं.

व्रत की कठिनाई में सबसे बड़ा अंतर

हरियाली तीज का व्रत अपेक्षाकृत सहज माना जाता है. इसमें महिलाएं अपनी परंपरा के अनुसार फलाहार या जल ग्रहण कर सकती हैं और सुखी वैवाहिक जीवन की कामना करती हैं. इसके विपरीत हरतालिका तीज का व्रत कठिन माना जाता है. इसमें दिन-रात अन्न और जल का त्याग किया जाता है. यह व्रत सुहाग की रक्षा, मनचाहे जीवनसाथी की कामना और माता पार्वती जैसी अडिग श्रद्धा का प्रतीक माना जाता है.