Hariyali Teej: पहली बार व्रत करने वाली महिलाएं ऐसे करें शिव-पार्वती की आराधना, हरियाली तीज पूजा विधि जानें
हरियाली तीज सावन का सबसे प्रमुख पर्व माना जाता है, जिसे सुहागिन और कुंवारी कन्याएं श्रद्धा के साथ मनाती हैं. पहली बार व्रत रखने वाली महिलाओं के लिए पूजा की सही विधि, शुभ मुहूर्त, सोलह श्रृंगार और शिव-पार्वती आराधना का विशेष महत्व बताया गया है.
नई दिल्ली: हरियाली तीज पूजा विधि जानने की उत्सुकता सावन के अंतिम चरण में सबसे अधिक बढ़ जाती है. हरियाली तीज पूजा विधि और माता पार्वती व्रत परंपरा के अनुसार पहली बार व्रत रखने वाली महिलाएं श्रद्धा, शुद्धता और संकल्प के साथ भगवान शिव की आराधना करती हैं. यह पर्व वैवाहिक सुख, सौभाग्य, प्रेम और पारिवारिक खुशहाली की कामना का पवित्र अवसर माना जाता है. इस दिन सुहागिन महिलाएं सोलह श्रृंगार करके बेलपत्र और पुष्प अर्पित करती हैं तथा मंगलकामना.
सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाया जाने वाला हरियाली तीज पर्व भगवान शिव और माता पार्वती के पुनर्मिलन का प्रतीक माना जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती ने कठोर तपस्या के बाद भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त किया था. इसी कारण यह व्रत दांपत्य प्रेम, समर्पण और अखंड सौभाग्य से जुड़ा माना जाता है तथा महिलाएं विशेष उत्साह के साथ इसे मनाती हैं.
पहली बार व्रत रखने वाली महिलाएं ऐसे करें पूजा
यदि आप पहली बार हरियाली तीज का व्रत रख रही हैं तो सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ, विशेष रूप से हरे रंग के वस्त्र धारण करें. इसके बाद निर्जला या अपनी परंपरा के अनुसार व्रत का संकल्प लें. पूजा स्थान को साफ कर चौकी पर भगवान शिव, माता पार्वती और श्रीगणेश की प्रतिमा स्थापित करें. श्रद्धा के साथ पूजा आरंभ करना सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है.
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सोलह श्रृंगार और सिंधारा का धार्मिक महत्व
हरियाली तीज पर सोलह श्रृंगार को सुहाग का प्रतीक माना जाता है. महिलाएं हरी चूड़ियां, मेहंदी, बिंदी, सिंदूर, चुनरी और अन्य श्रृंगार सामग्री धारण करती हैं. कई परिवारों में मायके से सिंधारा भेजने की परंपरा भी निभाई जाती है, जिसमें साड़ी, मिठाई और श्रृंगार का सामान शामिल होता है. यह परंपरा प्रेम, सम्मान और पारिवारिक स्नेह का प्रतीक मानी जाती है.
शिव पार्वती को क्या अर्पित करें?
पूजा के दौरान माता पार्वती को सुहाग की सामग्री अर्पित की जाती है, जबकि भगवान शिव को बेलपत्र, जल, अक्षत, धतूरा और पुष्प चढ़ाए जाते हैं. इसके बाद तीज व्रत कथा का श्रवण या पाठ किया जाता है. धूप दीप से आरती कर परिवार के बड़े बुजुर्गों का आशीर्वाद लेना भी शुभ माना जाता है. श्रद्धा और मन की पवित्रता को पूजा का सबसे बड़ा आधार माना गया है.
हरियाली तीज पर झूला झूलने की परंपरा क्यों है?
लोक मान्यताओं के अनुसार माता पार्वती के भगवान शिव से पुनर्मिलन की खुशी में उनकी सखियों ने झूला सजाया था. तभी से सावन और हरियाली तीज पर झूला झूलने की परंपरा चली आ रही है. महिलाएं झूला झूलते हुए पारंपरिक तीज गीत गाती हैं और उत्सव का आनंद मनाती हैं. हालांकि झूला झूलना धार्मिक अनिवार्यता नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और लोक परंपरा का हिस्सा माना जाता है.
शुभ मुहूर्त और व्रत का पारणा
हरियाली तीज का पर्व उदय तिथि के अनुसार 15 अगस्त को मनाया जाएगा. पूजा के लिए सूर्योदय से सुबह 9:08 बजे तक का समय विशेष रूप से शुभ माना गया है. व्रत का पारणा अगले दिन विधिवत पूजा, दान और भगवान शिव पार्वती की आराधना के बाद किया जाता है. धार्मिक मान्यताओं के अनुसार नियमपूर्वक किया गया यह व्रत सुखी वैवाहिक जीवन और परिवार की खुशहाली की कामना से जुड़ा माना जाता है.