नई दिल्लीः कई बार हार भी अच्छी होती है. पश्चिम बंगाल चुनाव के नतीजे सामने आने के बाद बीजेपी को महिला आरक्षण संबंधी संसोधन विधेयक पर मिली हार भी कुछ ऐसी ही साबित हो रही है. 17 अप्रैल, 2026 को पहली बार मोदी सरकार को किसी विधेयक पर हार का मुंह देखना पड़ा था. सरकार इस विधेयक को पास कराने के लिए जरूरी दो- तिहाई बहुमत नहीं जुटा पाई थी, लेकिन इसी हार ने बीजेपी को बंगाल में जीत दिलाने में बड़ा रोल प्ले किया है, ऐसा सियासी जानकार मानते हैं.
पश्चिम बंगाल, जो कांग्रेस के बाद तीन दशक से अधिक समय तक लेफ्ट का किला रहा और फिर पिछले डेढ़ दशक से टीएमसी का अभेद्य दुर्ग, पहली बार मोदी जी के मास्टर स्ट्रोक के चलते बीजेपी की झोली में जाता दिख रहा है. यूं तो बीजेपी को मिल रही बढ़त के तमाम पहलू हो सकते हैं, लेकिन सबसे खास पहलू ममता बनर्जी से महिलाओं का विश्वास कम होना माना जा रहा है और इसकी वजह बना है पिछले माह संसद में महिला आरक्षण संसोधन विधेयक पर विपक्ष का रुख, जिसमें ममता बनर्जी की पार्टी तृणमूल कांग्रेस भी शामिल रही.
सियासी जानकारों का मानना है कि लोकसभा में पर्याप्त अंकगणित न जुट पाने के कारण मोदी सरकार में पहली बार कोई विधेयक गिरा था. इसके बाद बीजेपी ने इस पर जमकर फील्डिंग की और अंततः विपक्ष को महिला विरोधी साबित करने में काफी हद तक कामयाब हो गई, बंगाल विधानसभा चुनाव परिणाम के रूझान कुछ ऐसे ही संकेत दे रहे हैं.
दरअसल, बंगाल में आधी आबादी बराबर की वोटर तो है ही, अपने बुरे- भले पर निर्णय भी खुद लेती है. महिलाओं में ममता बनर्जी का जनाधार ही उनकी लगातार जीत का मूल मंत्र था और महिला आरक्षण संसोधन विधेयक गिरने पर बीजेपी ने उसी मूल मंत्र में को छिन्न- भिन्न कर दिया. एंटी इनकमवेंसी और घुसपैंठ पर बीजेपी की स्पष्ट सोच भी इसका कारण रहा होगा लेकिन सबसे ज्यादा कारगर आधी आबादी का विश्वास हासिल करना ही रहा.