तमिलनाडु में क्यों बढ़ रही गैर-ब्राह्मण रणनीति? बड़ी पार्टियां मैदान में नहीं उतार रहे ब्राह्मण उम्मीदवार!
तमिलनाडु में लगातार ब्राह्मणों का प्रभाव घटता जा रहा है. जिसका असर उम्मीदवारों के चयन में भी नजर आ रहा है. कोई भी बड़ी पार्टी राज्य में ब्राह्मण उम्मीदवारों को टिकट नहीं दे रही है.
तमिलनाडु में 23 अप्रैल को 234 विधानसभा सीटों के लिए चुनाव होना है. इस चुनाव को लेकर सभी पार्टियों ने अपनी तैयारी शुरू कर दी है. पार्टियों द्वारा उम्मीदवारों के नाम घोषित किए जा रहे हैं, हालांकि अब तक जारी किए गए सूची में सभी पार्टियां एक जैसे पैटर्न को फॉलो करते नजर आ रही है. किसी भी बड़ी पार्टी से ब्राह्मणों को चेहरा बनने का मौका नहीं मिल रहा है.
राज्य की कुल आबादी में लगभग 3 प्रतिशत ब्राह्मण हैं, फिर भी किसी बड़ी पार्टी ने अब तक एक उम्मीदवार को भी मौका नहीं दिया है. AIADMK ने लगभग 35 सालों के इतिहास में पहली बार किसी ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया है. 2016 में जयललिता के निधन के बाद से पार्टी केवल एक ब्राह्मण उम्मीदवार को मौका दे रही थी. लेकिन इस बार एक के भी नाम नहीं हैं.
किस पार्टी ने कितने ब्राह्मण मतदाताओं को मैदान में उतारा?
भारतीय जनता पार्टी ने अपने 27 उम्मीदवारों के नाम ऐलान किए हैं, इनमें से एक भी ब्राह्मण चेहरा नहीं है. इसी तरह DMK और कांग्रेस की ओर से भी एक भी ब्राह्मण समुदाय के उम्मीदवार को टिकट नहीं दिया गया है. राजनीतिक विश्लेषक इसे द्रविड़ राजनीति के बढ़ते प्रभाव और गैर-ब्राह्मण सशक्तिकरण की रणनीति से जोड़कर देख रहे हैं. हालांकि अभिनेता विजय की पार्टी तमिलगा वेत्रि कझगम यानी TVK ने दो ब्राह्मण उम्मीदवारों को मैदान में उतारा है.
वहीं तमिल राष्ट्रवादी नेता सीमन की पार्टी नाम तमिलर कच्ची ने 6 ब्राह्मण उम्मीदवारों को मौका दिया है. रणनीतिकारों के मुताबिक ब्राह्मण मतदाताओं का वोट शुरू से ही AIADMK को मिलता रहा है, लेकिन जयललिता के निधन के बाद उनका झुकाव बीजेपी की ओर रहा है. जिसके कारण AIADMK भी ब्राह्मण उम्मीदवारों पर भरोसा नहीं कर रही है.
गैर-ब्राह्मण मतदाताओं पर फोकस
DMK का राजनीति शुरू से ही गैर-ब्राह्मण रही है, यही वजह है कि पार्टी ने ब्राह्मणों को टिकट न देने का कोई औपचारिक कारण नहीं बताया है. वहीं TVK ने दो ब्राह्मण उम्मीदवार को टिकट देकर केवल ब्राह्मण-विरोधी नहीं होने का संदेश दिया है. वहीं NTK के फैसले को सीमन के पेरियार-विरोधी रुख और द्रविड़ दीवार तोड़ने की उनकी बात से जोड़ा जा रहा है. तमिलनाडु में ब्राह्मणों का प्रभाव काफी घट चुका है. हालांकि फिर भी छोटी पार्टी ब्राह्मणों को अपने पक्ष में लाने की कोशिश कर रही है. वहीं बड़ी पार्टियां गैर-ब्राह्मण मतदाताओं पर फोकस कर रही है.
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