लठमार होली: किसके बनाए सुरक्षा कवच हुरियारों की करते हैं रक्षा?
ब्रज की शान लट्ठमार होली
बरसाना की लट्ठमार होली रंग, उमंग और परंपरा का अनोखा संगम है. यहां हुरियारिनें लाठियों से नंदगांव के हुरियारों का स्वागत करती हैं.
70 साल पुरानी परंपरा
बरसाना के रमेश मिस्त्री पिछले 70 वर्षों से इस परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं. यह हुनर उन्हें अपने पूर्वजों से मिला है.
ढाल ही असली सुरक्षा कवच
लाठियों की बौछार के बीच हुरियारों को बचाती है मजबूत ढाल. यह केवल औजार नहीं, बल्कि उनकी सुरक्षा का भरोसा है.
8 किलो की मजबूती
एक ढाल का वजन करीब 8 किलो होता है. इसे संभालना और वार झेलना हर किसी के बस की बात नहीं है.
होली से 45 दिन पहले शुरू तैयारी
सामान्य दिनों में घरेलू उपकरण ठीक करने वाले रमेश मिस्त्री होली से 45 दिन पहले ढाल बनाने में जुट जाते हैं.
शरीर के अनुसार ढाल का आकार
हर हुरियारे की कद काठी के अनुसार ढाल तैयार की जाती है. कोई बड़ी ढाल चाहता है तो कोई हल्की.
पहले लेदर की ढाल
पहले एक ही प्रकार की लेदर ढाल बनती थी. समय के साथ डिजाइन और सामग्री में बदलाव आया है.
नई डिजाइन की मांग
अब हवा ढाल और एलईडी लाइट वाली ढाल भी बन रही हैं लेकिन पारंपरिक मजबूत ढाल की मांग सबसे ज्यादा है.
दिखावे से ज्यादा सुरक्षा जरूरी
हुरियारे आकर्षण से ज्यादा मजबूती को महत्व देते हैं. इसलिए सादी और मजबूत ढाल को प्राथमिकता दी जाती है.
परंपरा को जीवित रखते कारीगर
रमेश मिस्त्री जैसे कारीगरों की मेहनत से लट्ठमार होली की गरिमा बनी हुई है. उनके बिना यह परंपरा अधूरी है.