नई दिल्ली: कई बार बैंकिंग सिस्टम में तकनीकी गड़बड़ी या मानवीय गलती के कारण किसी व्यक्ति के खाते में गलती से पैसे आ जाते हैं. अचानक खाते में बढ़ा बैलेंस देखकर लोग अक्सर भ्रम में पड़ जाते हैं और सोचते हैं कि यह रिफंड या कोई लाभ राशि है लेकिन कानून की नजर में यह रकम उस खाताधारक की नहीं मानी जाती.
ऐसी स्थिति में खाताधारक की जिम्मेदारी होती है कि वह तुरंत बैंक को इसकी जानकारी दे. अगर कोई व्यक्ति जानबूझकर गलती से आए पैसे को अपने पास रखता है या खर्च कर देता है, तो यह अपराध की श्रेणी में आता है. भारतीय कानून के अनुसार, यह मामला आपराधिक विश्वासघात माना जाता है.
अगर व्यक्ति को यह पता है कि पैसे उसकी संपत्ति नहीं हैं और फिर भी वह उन्हें लौटाने से इनकार करता है, तो उसके खिलाफ कानूनी कार्रवाई हो सकती है. भारतीय न्याय संहिता की धारा 316 ऐसे मामलों पर लागू होती है. इस धारा के तहत, किसी और की संपत्ति या धन का गलत इस्तेमाल करने पर सजा का प्रावधान है.
दोषी पाए जाने पर व्यक्ति को तीन साल तक की जेल हो सकती है. इसके अलावा जुर्माना या जेल और जुर्माना दोनों भी लगाए जा सकते हैं. बैंक को जैसे ही यह जानकारी मिलती है कि रकम गलती से ट्रांसफर हुई है, वह खाताधारक को आधिकारिक सूचना भेजता है.
अगर खाताधारक सहयोग करता है और पैसे वापस कर देता है, तो मामला वहीं खत्म हो जाता है लेकिन अगर वह मना करता है या पैसे खर्च कर चुका होता है, तो बैंक पुलिस में शिकायत दर्ज कराता है.
इसके बाद मामला आपराधिक केस में बदल जाता है. कोर्ट में दोष सिद्ध होने पर केवल सजा ही नहीं मिलती, बल्कि रिकवरी की प्रक्रिया भी शुरू होती है. बैंक सिविल कोर्ट के माध्यम से आरोपी से रकम वसूल सकता है. यह वसूली बैंक बैलेंस, सैलरी या चल अचल संपत्ति से की जा सकती है. कानून का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि गलती से आए पैसे का गलत फायदा न उठाया जाए.
इसलिए लोगों को सलाह दी जाती है कि खाते में अनजान रकम दिखे तो तुरंत बैंक से संपर्क करें. ऐसा करना न केवल आपको कानूनी परेशानी से बचाता है, बल्कि ईमानदारी का भी परिचय देता है.