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India Daily

बैंक लॉकर में रखा सामान चोरी होने पर ग्राहक को अधिकतम कितना मुआवजा मिल सकता है?

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों के मुताबिक, अगर बैंक की लापरवाही के चलते लॉकर में रखा सामान चोरी हो जाए, लूट, डकैती, आग या अन्य किसी दुर्घटना में नुकसान हो जाए, तो बैंक की जिम्मेदारी सीमित होती है.

Anuj
Edited By: Anuj
बैंक लॉकर में रखा सामान चोरी होने पर ग्राहक को अधिकतम कितना मुआवजा मिल सकता है?
Courtesy: Chat GPT

नई दिल्ली: राजधानी दिल्ली में रहने वाली एक महिला ने दावा किया है कि उसके बैंक लॉकर में रखे लगभग 60 लाख रुपये के गहने चोरी हो गए हैं. महिला के अनुसार, जब उसने लॉकर खोला तो उसमें रखे जेवर गायब थे. इसके बाद उसने तुरंत बैंक अधिकारियों और पुलिस को इसकी शिकायत दी. महिला का कहना है कि चोरी बैंक लॉकर के अंदर से हुई है, इसलिए बैंक की जिम्मेदारी बनती है.

यह मामला सामने आने के बाद उसी बैंक में लॉकर रखने वाले कई अन्य ग्राहक भी घबरा गए और अपने-अपने लॉकर की जांच करने पहुंचे. हालांकि, बैंक की ओर से बताया गया कि अन्य किसी ग्राहक के लॉकर में चोरी या छेड़छाड़ की घटना सामने नहीं आई है. फिर भी इस घटना ने लोगों के मन में बैंक लॉकर की सुरक्षा को लेकर कई सवाल खड़े कर दिए हैं.

बैंक लॉकर में रखा सामान कितना सुरक्षित?

कई लोग अब यह सोच रहे हैं कि बैंक लॉकर में रखा सामान वास्तव में कितना सुरक्षित होता है. और साथ ही यह भी सवाल उठ रहा है कि यदि लॉकर से सामान चोरी हो जाए या नुकसान हो जाए तो बैंक ग्राहक को कितना मुआवजा देता है.

RBI का नियम क्या है?

रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) के नियमों के मुताबिक, अगर बैंक की लापरवाही के चलते लॉकर में रखा सामान चोरी हो जाए, लूट, डकैती, आग या अन्य किसी दुर्घटना में नुकसान हो जाए, तो बैंक की जिम्मेदारी सीमित होती है. नियम कहता है कि बैंक अधिकतम मुआवजा लॉकर के सालाना किराए के 100 गुना तक ही दे सकता है.

बैंक पर कानूनी बाध्यता नहीं होती

उदाहरण के लिए यदि कोई ग्राहक बैंक को लॉकर के लिए सालाना 3,000 रुपये किराया देता है, तो चाहे लॉकर में रखे सामान की कीमत लाखों में क्यों न हो, बैंक अधिकतम 3 लाख रुपये (3,000 × 100) तक ही मुआवजा देने के लिए बाध्य होगा. इससे अधिक राशि का भुगतान करने की बैंक पर कानूनी बाध्यता नहीं होती.

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, बैंक लॉकर व्यवस्था मूल रूप से किरायेदार और पट्टेदार के रिश्ते पर आधारित होती है. यानी बैंक सिर्फ आपको सुरक्षित स्थान उपलब्ध कराता है, लेकिन लॉकर में रखे सामान का सत्यापन या कब्जा नहीं लेता.

विशेषज्ञों का कहना है कि भले ही ग्राहक बैंक को यह बता दे कि उसने लॉकर में क्या रखा है और उसकी कीमत कितनी है, तब भी बैंक की कानूनी जिम्मेदारी नहीं बढ़ती. बैंक को यह भी पता नहीं होता कि ग्राहक ने वास्तव में क्या रखा है. इसी कारण लॉकर से गहने या अन्य कीमती सामान गायब होने पर बैंक को उनके पूरे बाजार मूल्य का भुगतान करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता.