'हिंदू परिवारों में हों कम से कम 2 से 3 बच्चे', हरिद्वार से संतों का बड़ा संदेश
हरिद्वार में विश्व हिंदू परिषद की बैठक में संतों ने हिंदू समाज से दो से तीन बच्चे पैदा करने का आह्वान किया. बैठक में घटती प्रजनन दर, जनसांख्यिकीय बदलाव और परिवार व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर चिंता जताई गई.
हरिद्वार में आयोजित विश्व हिंदू परिषद की केंद्रीय मार्गदर्शक मंडल बैठक में जनसंख्या संतुलन और परिवार व्यवस्था प्रमुख चर्चा के विषय रहे. संत समाज ने हिंदू समुदाय में घटती प्रजनन दर को गंभीर चिंता का विषय बताते हुए परिवार विस्तार की आवश्यकता पर जोर दिया. बैठक में यह भी कहा गया कि समाज के भविष्य, सांस्कृतिक संरचना और जनसांख्यिकीय स्थिति को ध्यान में रखते हुए जागरूकता अभियान चलाने की जरूरत है. इसके साथ ही परिवार और विवाह से जुड़े बदलते सामाजिक स्वरूपों पर भी विस्तार से चर्चा हुई.
जनसंख्या को लेकर संतों की चिंता
बैठक में अखिल भारतीय संत समिति के राष्ट्रीय महासचिव दंडी स्वामी जितेंद्रानन्द सरस्वती ने कहा कि कई हिंदू जाति और वर्गों में प्रजनन दर लगातार नीचे जा रही है. संतों का मानना है कि यह केवल आंकड़ों का विषय नहीं बल्कि समाज की दीर्घकालिक संरचना से जुड़ा मुद्दा है. इसी कारण विश्व हिंदू परिषद ने इसे अपनी प्रमुख प्राथमिकताओं में शामिल किया है. बैठक में यह विचार सामने आया कि समाज में एक बच्चे तक सीमित रहने की प्रवृत्ति पर पुनर्विचार होना चाहिए और परिवारों को दो से तीन बच्चों के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए.
परिवार को नए विमर्श का केंद्र बनाने की तैयारी
बैठक में यह भी कहा गया कि संगठन का चिंतन केवल धार्मिक स्थलों और परंपराओं तक सीमित नहीं है. परिवार, विवाह, सामाजिक एकता और सांस्कृतिक मूल्यों को भी उतना ही महत्वपूर्ण माना जा रहा है. चर्चा के दौरान यह बात सामने आई कि भविष्य के भारत की सामाजिक संरचना को मजबूत बनाए रखने के लिए परिवार संस्था को केंद्र में रखना जरूरी है. संतों ने कहा कि बदलते समय में पारिवारिक मूल्यों को मजबूत करने और सामाजिक जागरूकता बढ़ाने के लिए व्यापक स्तर पर संवाद की आवश्यकता है.
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जनसांख्यिकीय बदलावों पर विशेष चर्चा
बैठक के दौरान जनसांख्यिकीय परिवर्तनों और उनके संभावित प्रभावों पर भी विचार-विमर्श किया गया. संत समाज ने कुछ क्षेत्रों में बदलते सामाजिक और धार्मिक समीकरणों को लेकर चिंता व्यक्त की. साथ ही सीमावर्ती राज्यों में सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों को बढ़ाने पर भी जोर दिया गया. उनका कहना था कि समाज में जागरूकता और संगठनात्मक सक्रियता के माध्यम से सांस्कृतिक पहचान को मजबूत किया जा सकता है. इस विषय को भविष्य की रणनीति का हिस्सा बनाने पर भी सहमति बनी.
लिव-इन संबंधों और कानूनों पर उठे सवाल
बैठक में लिव-इन संबंधों से जुड़े कानूनी प्रावधानों पर भी चर्चा हुई. संत समाज का मत था कि भारतीय परिवार व्यवस्था केवल व्यक्तिगत संबंधों का ढांचा नहीं बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों का आधार है. उन्होंने कहा कि जब ऐसे संबंधों को कानूनी मान्यता मिलती है तो कई सामाजिक और कानूनी प्रश्न सामने आते हैं. इसी संदर्भ में परिवार से जुड़े कानूनों की समीक्षा की मांग भी उठाई गई. संतों का मानना है कि सामाजिक बदलावों के बीच पारिवारिक व्यवस्था और सांस्कृतिक मूल्यों के संरक्षण पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए.