देवभूमि के 23 ग्लेशियरों पर मंडराया खतरा! 25.6 किमी पीछे हटी बर्फ, नई रिसर्च ने बढ़ाई चिंता

उत्तराखंड के 23 प्रमुख ग्लेशियरों पर नई वैज्ञानिक समीक्षा में कुल 25,621 मीटर का संचयी रिट्रीट दर्ज हुआ है. खतलिंग सबसे तेज पीछे हटने वाला ग्लेशियर है, जिसकी दर 88 मीटर सालाना रही.

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Kuldeep Sharma

उत्तराखंड के हिमालयी ग्लेशियरों में हो रहे बदलाव की तस्वीर नई वैज्ञानिक समीक्षा में सामने आई है. शोधकर्ताओं ने 23 प्रमुख ग्लेशियरों से जुड़े पुराने अध्ययनों, सैटेलाइट तस्वीरों और अन्य आंकड़ों का विश्लेषण किया. समीक्षा में अलग-अलग अवधियों के रिकॉर्ड को मिलाकर 25,621.01 मीटर का संचयी ग्लेशियर रिट्रीट दर्ज किया गया.

23 ग्लेशियरों के पीछे हटने से बढ़ी चिंता

नई समीक्षा में भारतीय मध्य हिमालय के 23 ग्लेशियरों के बदलाव का अध्ययन किया गया है. इसमें कुल संचयी रिट्रीट 25,621.01 मीटर दर्ज किया गया, जबकि अलग-अलग ग्लेशियरों की औसत रिट्रीट दर में काफी अंतर मिला. वैज्ञानिकों के मुताबिक ग्लेशियरों पर तापमान के साथ उनकी ऊंचाई, ढलान, आकार, दिशा और सतह पर जमा मलबे का भी असर पड़ता है.

खतलिंग सबसे तेज पीछे हटने वाले ग्लेशियरों में

टिहरी गढ़वाल का खतलिंग ग्लेशियर इस अध्ययन में सबसे तेज रिट्रीट वाले ग्लेशियरों में सामने आया है. 1965 से 2014 के बीच इसका स्नाउट करीब 4,340 मीटर पीछे गया और औसत रफ्तार 88 मीटर सालाना रही. पुराने अध्ययन के अनुसार इस बदलाव के दौरान ग्लेशियर कई छोटे हिस्सों में बंट गया.


मिलाम और गंगोत्री की स्थिति भी अहम

पिथौरागढ़ का मिलाम ग्लेशियर भी लगातार पीछे हटने वाले ग्लेशियरों में शामिल है. उपलब्ध रिकॉर्ड में इसकी रिट्रीट दर अलग-अलग अवधियों में करीब 32 से 37.8 मीटर सालाना बताई गई है. गंगोत्री ग्लेशियर के 1935 से 2004 के रिकॉर्ड में लगभग 22 मीटर प्रति वर्ष की दर दर्ज हुई. इससे साफ है कि सभी ग्लेशियर एक जैसी गति से नहीं बदल रहे हैं.

सिर्फ बढ़ता तापमान ही वजह नहीं

अध्ययन में ग्लेशियरों के पीछे हटने को केवल तापमान बढ़ने से जोड़कर नहीं देखा गया है. बर्फ के ऊपर मौजूद चट्टानी मलबा कई जगह गर्मी से बचाव की परत जैसा काम करता है, जिससे पिघलने की गति प्रभावित होती है. इसके अलावा ग्लेशियर की भौगोलिक बनावट और पानी के संपर्क में आने की स्थिति भी रिट्रीट को बदल सकती है.