नई दिल्ली: विश्व संगीत दिवस के अवसर पर उत्तराखंड का लोक संगीत नई ऊंचाइयों को छूता नजर आ रहा है. कभी गांवों, मेलों और पारंपरिक आयोजनों तक सीमित रहने वाली पहाड़ की धुनें अब डिजिटल दुनिया के माध्यम से वैश्विक पहचान बना रही हैं. तकनीक और आधुनिक संगीत शैली के मेल ने उत्तराखंड के लोक संगीत को नई पीढ़ी के बीच लोकप्रिय बना दिया है.
उत्तराखंड का संगीत अब केवल ढोल, दमाऊ और पारंपरिक लोक वाद्य यंत्रों तक सीमित नहीं है. इंटरनेट और म्यूजिक स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ने इसे नई दिशा दी है. यूट्यूब, इंस्टाग्राम, फेसबुक, स्पॉटिफाई, जियोसावन और अन्य डिजिटल मंचों के जरिए पहाड़ी गीत दुनिया भर के श्रोताओं तक पहुंच रहे हैं.
पहले जहां लोक संगीत की पहचान केवल स्थानीय क्षेत्रों तक सीमित थी, वहीं अब डिजिटल प्लेटफॉर्म की मदद से यह लाखों लोगों की पसंद बन चुका है. सोशल मीडिया के बढ़ते प्रभाव ने लोक संगीत को नई पहचान दिलाई है और कलाकारों को व्यापक मंच उपलब्ध कराया है.
फ्योंलड़िया, नथुली, काफल पाको और मेरी गैलिमा जैसे लोकप्रिय गीतों ने इंटरनेट पर नई पहचान बनाई है. इन गीतों में पहाड़ी संस्कृति और भाषा को बरकरार रखते हुए आधुनिक संगीत तकनीकों का इस्तेमाल किया जा रहा है. डिजिटल मास्टरिंग, साउंड लेयरिंग, इलेक्ट्रॉनिक बीट्स और नए संगीत प्रयोगों ने इन लोक धुनों को युवाओं के बीच और अधिक आकर्षक बना दिया है. यही वजह है कि ये गीत अब केवल उत्तराखंड तक सीमित नहीं रहे बल्कि देश और विदेश में भी पसंद किए जा रहे हैं.
नई पीढ़ी के कलाकार उत्तराखंड के संगीत को आधुनिक रूप देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं. रोहित चौहान, किशन महिपाल, प्रियंका मेहर, अनीश रंगहार और केशर पंवार जैसे कलाकार लोक संगीत और आधुनिक फ्यूजन का सफल संगम पेश कर रहे हैं.
गिटार, सिंथेसाइजर और बास लाइन जैसे आधुनिक वाद्य यंत्रों के प्रयोग से तैयार किए जा रहे गीत सोशल मीडिया और डिजिटल मंचों पर तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं. इन कलाकारों ने पारंपरिक धुनों को नए अंदाज में प्रस्तुत कर युवाओं को अपनी संस्कृति से जोड़ने का काम किया है.
उत्तराखंड के लोक संगीत को जन-जन तक पहुंचाने में वरिष्ठ कलाकारों का भी बड़ा योगदान रहा है. नरेंद्र सिंह नेगी ने लोकगीतों को नई पहचान दी, जबकि प्रीतम भरतवान ने जागर परंपरा को संरक्षित और लोकप्रिय बनाने का कार्य किया. मीना राणा, बसंती बिष्ट और माधुरी बर्थवाल ने भी लोक संगीत और सांस्कृतिक विरासत को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है.
वहीं पांडवाज, बरामासा और अन्य फोक बैंड पारंपरिक लोक संगीत को आधुनिक साउंड के साथ जोड़कर नई पहचान दे रहे हैं. ये समूह न केवल फ्यूजन संगीत तैयार कर रहे हैं बल्कि ढोल, दमाऊ, हुड़का, रणसिंघा, तुरही, मसकबीन, बांसुरी, थाली और मंजीरा जैसे पारंपरिक वाद्य यंत्रों की सांस्कृतिक विरासत को भी जीवित रखे हुए हैं.