बदरी-केदार की धरती पर आज भी गूंजती है पांडवों की अमर गाथा, लोकनृत्य में जीवित है इतिहास
उत्तराखंड का पांडव नृत्य केवल लोकनृत्य नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और सामाजिक जीवन का अनूठा संगम है. महाभारत से जुड़ी मान्यताओं पर आधारित यह परंपरा आज भी गांवों में लोगों को अपनी जड़ों से जोड़े रखती है.
देहरादून: उत्तराखंड की सांस्कृतिक पहचान में पांडव नृत्य का विशेष स्थान है. गढ़वाल क्षेत्र में सदियों से निभाई जा रही यह परंपरा महाभारत काल की स्मृतियों को जीवंत करती है. शीतकाल के दौरान गांवों में होने वाले इस आयोजन में नृत्य, संगीत, अभिनय और लोक आस्था का अद्भुत मेल दिखाई देता है. यही कारण है कि पांडव नृत्य केवल मनोरंजन का माध्यम नहीं, बल्कि लोकजीवन और धार्मिक विश्वासों का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है.
गढ़वाल में यह मान्यता प्रचलित है कि महाभारत काल में पांडवों का इस क्षेत्र से गहरा संबंध रहा. युद्ध के बाद उन्होंने बदरी-केदार क्षेत्र में भगवान शिव की आराधना की और फिर स्वर्गारोहण के मार्ग पर आगे बढ़े. इन्हीं कथाओं के कारण स्थानीय लोग पांडवों को लोक देवता के रूप में सम्मान देते हैं. यही आस्था पांडव नृत्य की आधारशिला मानी जाती है.
सर्दियों में जीवंत होती परंपरा
खेती का काम पूरा होने के बाद नवंबर और दिसंबर में गांवों में पांडव नृत्य का आयोजन शुरू होता है. रुद्रप्रयाग के तल्ला नागपुर क्षेत्र और जौनसार-बावर में इसकी विशेष धूम रहती है. इस अवसर पर बाहर रहने वाले लोग भी अपने गांव लौटते हैं. परिवारों का मिलन होता है और लंबे समय से बंद घरों में फिर से रौनक दिखाई देने लगती है.
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ढोल की ताल और पश्वा का रहस्य
पांडव नृत्य की सबसे अनोखी विशेषता ढोल-दमाऊ की विशेष ताल है. स्थानीय मान्यता के अनुसार इन तालों पर पांडवों के पश्वा अवतरित होते हैं. युधिष्ठिर, भीम, अर्जुन, नकुल, सहदेव और द्रौपदी सहित विभिन्न पात्रों के लिए अलग-अलग ताल बजाई जाती है. गांव के लोग इसे आध्यात्मिक अनुभव के रूप में देखते हैं.
जीवन के हर रंग की प्रस्तुति
पांडव नृत्य केवल धार्मिक आयोजन नहीं है. इसमें पांडवों के जीवन, युद्ध, खेती, पारिवारिक संबंधों और संघर्षों को गीत, संवाद और अभिनय के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है. हास्य, व्यंग्य, वीरता और भावनाओं का संतुलित समावेश इसे अन्य लोकनृत्यों से अलग पहचान देता है.
ढोली की भूमिका सबसे अहम
इस पूरी प्रस्तुति का संचालन ढोली करता है. वह महाभारत की कथाओं को अपने ज्ञान और अनुभव के आधार पर गीतों और संवादों में पिरोता है. पांडव नृत्य की कोई लिखित स्क्रिप्ट नहीं होती. ढोली कथा के अनुसार सुर और लय में बदलाव लाता है, जबकि गांव के बुजुर्ग भी समय-समय पर इसमें शामिल होकर प्रस्तुति को और प्रभावशाली बनाते हैं.