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बाबा दुकान' विवाद: बुजुर्ग मुस्लिम का साथ देने पर दीपक को चुकानी पड़ रही इंसानियत निभाने की कीमत, जिम बंद होने की कगार पर

कोटद्वार का मामला इन दिनों चर्चे में है. दीपक का जीवन इस घटना के बाद पूरी तरह से बदल चुका है. उन्होंने बताया कि उनके जिम में पहले 150 लोग आया करते थे, लेकिन अब केवल 15 बचे हैं.

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Shanu Sharma

उत्तराखंड के कोटद्वार का मामला इन दिनों काफी चर्चे में हैं. जिसमें एक 70 साल के मुस्लिम आदमी के दुकान के नाम पर शुरु हुए विवाद में एक दीपक कुमार नाम का व्यक्ति काफी लाइमलाइट में आया. इस मामले में दीपक ने अकेले उस मुस्लिम व्यक्ति के लिए लड़ाई लड़ी. इसके लिए उन्होंने खुद की पहचान मोहम्मद दीपक तक बता दिया. हालांकि उन्हें इसका बड़ा खामियाजा उठाना पड़ रहा है.  

दीपक एक किराए के मकान में जिम चलाते हैं. जिसमें इस विवाद से पहले 150 लोग आते थे, हालांकि इस घटना के बाद लोगों की संख्या घटकर अब 15 हो चुकी है. इससे दीपक का जीवन काफी प्रभावित हुआ है. इतना ही नहीं दीपक का यह भी कहना है कि उसे अभी भी धमकियां मिल रही है. 

क्या है पूरा मामला?

यह पूरा विवाद 26 जनवरी को नजरों में आया, जब कुछ लोगों का झुंड एक 70 साल के मुस्लिम व्यक्ति के दुकान के नाम से  बाबा शब्द हटाने का दबाव बना रहे थे. तभी दीपक उनकी मदद के लिए सबसे भिड़ गए. वहीं जब उनसे नाम पूछा गया तो उन्होंने अपना नाम मोहम्मद दीपक बताया. इस पूरी घटना का वीडियो वायरल हो गया.

इस घटना के बाद पूरा शहर दो ग्रुप में बंट गया. एक वे जो दीपक के नाम बदलने पर नाखुश थे और वहीं दूसरा वे जो उनका साथ दे रहे थे. इस घटना के एक हफ्ते बाद दीपक ने अपने हाल के बारे में बताते हुए कहा कि  'आधे शहर के लोग मेरा साथ देते हैं, लेकिन जब आप अच्छे काम करते हैं तो लोग तारीफ नहीं करते. ईमानदारी की कीमत चुकानी पड़ सकती है.

लोन भरना हुआ मुश्किल

दीपक कुमार ने कहा कि लोग डरे हुए हैं, और मैं यह समझता हूं. हालांकि, जिम पूरे फ़्लोर पर चलता है जिसका किराया 40,000 रुपये प्रति महीना है. हमारे परिवार की सिर्फ एक ही इनकम है. मैंने हाल ही में घर बनाया है और अभी भी 16,000 रुपये का हर महीने का लोन चुका रहा हूं.

उन्होंने कहा कि बाकी सदस्यों ने उन्हें भरोसा दिलाया कि वे यहीं रहेंगे. हालांकि सदस्यों के जाने की दर बहुत ज़्यादा है, अगर आप एक सदस्य खो देते हैं, तो उसे वापस पाना मुश्किल होता है. उन्होंने कहा कि मुझे अभी भी नहीं लगता कि मैंने कुछ गलत किया है. बाहर के लोग इस बात को समझ रहे हैं लेकिन शहर के लोग नहीं मान रहे.