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लंदन फिल्म फेस्टिवल में पहुंची 85 साल की सुदेशा देवी की प्रेरक कहानी

फिल्म सुदेशा देवी के संघर्ष और चिपको आंदोलन में उनके योगदान को खूबसूरती से दिखाती है. करीब 50 साल पहले उत्तराखंड के हिमालयी इलाकों में महिलाओं ने पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले लगा लिया था. इस आंदोलन को 'चिपको आंदोलन' नाम मिला. फिल्म इन्हीं महिलाओं की हिम्मत और समर्पण की कहानी बताती है.

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Edited By: Antima Pal
लंदन फिल्म फेस्टिवल में पहुंची 85 साल की सुदेशा देवी की प्रेरक कहानी
Courtesy: X

Sudesha Devi Story: उत्तराखंड की एक मजबूत और साहसी महिला की कहानी अब दुनिया के सामने आएगी. डॉक्यूमेंट्री 'दिस ट्री वोंट फॉल' का चयन लंदन इंडियन फिल्म फेस्टिवल के लिए हो गया है. यह 30 मिनट की फिल्म 85 वर्षीय पर्यावरण योद्धा सुदेशा देवी के जीवन पर आधारित है.

फिल्म सुदेशा देवी के संघर्ष और चिपको आंदोलन में उनके योगदान को खूबसूरती से दिखाती है. करीब 50 साल पहले उत्तराखंड के हिमालयी इलाकों में महिलाओं ने पेड़ों को बचाने के लिए उन्हें गले लगा लिया था. इस आंदोलन को 'चिपको आंदोलन' नाम मिला. फिल्म इन्हीं महिलाओं की हिम्मत और समर्पण की कहानी बताती है.

चार साल की लगन

इस डॉक्यूमेंट्री को बनाने में चार साल का समय लगा. फिल्म उत्तराखंड के छोटे-छोटे गांवों की उन महिलाओं को केंद्र में रखती है, जिन्होंने कम संसाधनों के बावजूद जंगलों की रक्षा की. फिल्म दिखाती है कि कैसे महिलाओं ने सामाजिक बाधाओं को पार करते हुए प्रकृति संरक्षण का ऐतिहासिक काम किया.

लेखक दीपक रमोला ने बताया कि चिपको आंदोलन गौरा देवी जैसी महिलाओं की वजह से शुरू हुआ. ये महिलाएं जंगलों को अपना घर मानती थीं. 'दिस ट्री वोंट फॉल' उसी भावना को आगे बढ़ाती है. फिल्म सुदेशा देवी की जिंदगी के जरिए बताती है कि पेड़ों को बचाना कितना जरूरी है.

टीम का योगदान

फिल्म की कहानी दीपक रमोला और अपूर्वा बख्शी ने लिखी है. निर्माण अपूर्वा बख्शी, दीपक रमोला और मनीषा त्यागराजन की टीम ने किया. ध्रुव वर्मा और सिद्धार्थ गोविंदन ने कैमरा संभाला. संपादन अजीत नायर और ध्रुव वर्मा ने किया. फिल्म का सुंदर संगीत ताजदार जुनैद ने तैयार किया है.

फिल्म का संदेश

यह डॉक्यूमेंट्री सिर्फ एक कहानी नहीं, बल्कि पर्यावरण बचाने का बड़ा संदेश है. यह युवाओं को प्रेरित करती है कि प्रकृति हमारा जीवन आधार है. जंगलों को बचाना मतलब पानी, हवा और भविष्य को बचाना है. फिल्म महिलाओं की ताकत को भी उजागर करती है.

लंदन इंडियन फिल्म फेस्टिवल में शामिल होने से सुदेशा देवी की मेहनत को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलेगी. सुदेशा देवी आज भी अपनी उम्र के अनुसार पर्यावरण से जुड़े काम करती रहती हैं. उनकी कहानी साबित करती है कि चाहे उम्र कितनी भी हो, सही काम के लिए हिम्मत हमेशा काम आती है.